3 लाख साल पुराना कब्रिस्तान: क्या आदिमानव समाज में महिलाओं को मिलता था सर्वोच्च सम्मान?
दक्षिण अफ्रीका की अंधेरी गुफाओं में दफन Homo Naledi के अवशेषों ने मानव विकास के इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया है. 20 कंकालों की जांच में एक भी पुरुष चिन्ह न मिलना क्या किसी महिला-प्रधान समाज की ओर इशारा करता है या फिर इसके पीछे छिपा है कोई आनुवंशिक रहस्य?
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: मानव सभ्यता और विकास के इतिहास में यह धारणा काफी लंबे समय से घर किए हुए थे कि औपचारिक रीति-रिवाजों और रीति-नीति के साथ मृतकों का अंतिम संस्कार या दफनाने की परंपरा केवल आधुनिक मानव यानी होमो सेपियंस की ही देन है. हमारी यह सोच रही है कि ऐसी चेतना और बुद्धिमत्ता केवल बड़ी खोपड़ी और विकसित मस्तिष्क वाले मानवों में ही संभव थी. हालांकि, आधुनिक नृविज्ञान और पुरातत्व की हालिया खोजों ने इस पुरानी अवधारणा को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है. दक्षिण अफ्रीका की प्रसिद्ध 'राइजिंग स्टार' गुफा से मिले अवशेषों ने वैज्ञानिकों के सामने एक ऐसा रहस्य खड़ा कर दिया है, जिसने पूरे वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में हलचल मचा दी है.
अंधियारी गुफा में दफन एक अनसुलझा इतिहास
जोहान्सबर्ग के पास स्थित 'राइजिंग स्टार' गुफा के बेहद संकरे और अंधेरे रास्तों के नीचे एक ऐसी दुनिया सोई हुई थी, जो आज से लगभग 2 लाख 36 हजार से 3 लाख 35 हजार साल पुरानी है. यहाँ निवास करने वाली प्रजाति को 'होमो नालेडी' के नाम से जाना जाता है. आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रजाति के मस्तिष्क का आकार बेहद छोटा था—लगभग एक संतरे जितना, जो आधुनिक मानव के दिमाग का महज एक-तिहाई हिस्सा है. इतने छोटे दिमाग के बावजूद यह प्रजाति सचेत रूप से अपने मृतकों को दफनाती थी, आग जलाना जानती थी और गुफा की दीवारों पर कलाकृतियां भी उकेरती थी. यह खोज साबित करती है कि बुद्धिमत्ता का विकास किसी एक सीधी रेखा में नहीं हुआ और न ही यह केवल होमो सेपियंस तक सीमित था.
20 कंकालों की जांच में चौंकाने वाला खुलासा
इस गुफा के सबसे गहरे हिस्से से प्राप्त 20 कंकालों का जब वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया, तो शोधकर्ता स्तब्ध रह गए. आमतौर पर मानव में लिंग निर्धारण दांतों के इनेमल में मौजूद 'एमेलोजेनिन' नामक प्रोटीन के विश्लेषण से किया जाता है, जो X और Y क्रोमोसोम के सिग्नल देता है. वैज्ञानिकों ने जब इन कंकालों के 23 दांतों के नमूनों की जांच की, तो हर एक नमूने में X सिग्नल तो स्पष्ट दिखाई दिया, लेकिन Y सिग्नल पूरी तरह नदारद था. इस आधार पर कम से कम 19 कंकालों की पहचान महिलाओं के रूप में हुई है, जबकि अंतिम कंकाल का प्रोफाइल भी महिलाओं से मेल खाता है. सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि गुफा की सबसे बड़ी खोपड़ी 'नियो', जिसे वैज्ञानिक अब तक एक मजबूत पुरुष मान रहे थे, वह भी अध्ययन में एक महिला ही निकली.
क्या यह जानबूझकर बनाया गया केवल महिलाओं का कब्रिस्तान था?
शोध का नेतृत्व कर रहे प्रोफेसर ली बर्गर का मानना है कि होमो नालेडी प्रजाति लिंग के आधार पर सचेत होकर अपने मृतकों को दफनाती थी. आधुनिक मानवों के इतिहास में भी यदि कहीं लिंग के आधार पर शवों को अलग किया गया, तो वहां मृत पुत्रों को मां के साथ दफनाया जाता था. लेकिन राइजिंग स्टार गुफा में बच्चियों के अवशेष तो मिले, पर एक भी बालक का कंकाल नहीं मिला. हालांकि, कुछ वैज्ञानिक दफनाने के इस सिद्धांत पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं, फिर भी वे यह स्वीकार करते हैं कि इन शवों को इतनी दुर्गम गुफा में ले जाना किसी गहरी भावनात्मक या सांस्कृतिक परंपरा के बिना संभव नहीं था. यह सवाल अब भी बरकरार है कि पुरुषों के अवशेष कहां गए? क्या वे किसी अन्य सुरंग में हैं, या फिर उस समाज में महिलाओं की स्थिति इतनी सर्वोच्च थी कि अंतिम विदाई में उन्हें यह विशेष सम्मान दिया जाता था?
जैविक त्रुटि या आनुवंशिक रहस्य?
इस निष्कर्ष पर सभी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं. स्पेन के बार्सिलोना के आणविक जीवविज्ञानी कार्ल्स लालुएज़ा-फॉक्स का तर्क है कि सदियों के कालचक्र में प्रोटीन के नष्ट होने से Y सिग्नल लुप्त हो गया हो सकता है. इसके अलावा, एक वैज्ञानिक संभावना 'जीन डिलीशन' की भी है. यदि होमो नालेडी के पुरुषों में जन्मजात रूप से Y क्रोमोसोम पर वह विशिष्ट जीन अनुपस्थित रहा हो, तो परीक्षण में वे हमेशा महिला के रूप में ही दिखाई देंगे. ऐसा आनुवंशिक बदलाव आधुनिक दुनिया की कुछ दुर्लभ आबादी और प्राचीन नियैंडरथल में भी देखा गया है.
फिलहाल वैज्ञानिक इस पहेली को सुलझाने के लिए किसी स्पष्ट पुरुष कंकाल की तलाश में जुटे हैं. वजह चाहे जो भी हो, राइजिंग स्टार गुफा की इस खोज ने यह साबित कर दिया है कि मानव इतिहास के पन्नों में आज भी ऐसे कई पन्ने हैं जिन्हें पढ़ा जाना बाकी है.