दवाओं की MRP पर सुप्रीम कोर्ट: 'क्या व्यवस्था केवल फार्मा कंपनियों की मदद के लिए है?'
दवाओं के भारी-भरकम एमआरपी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: केंद्र सरकार से पूछा सवाल— क्या पूरी व्यवस्था सिर्फ दवा कंपनियों की मदद के लिए काम कर रही है? आदेश सुरक्षित.
नई दिल्ली । डेस्क: एमआरपी (MRP) और रिटेलर प्राइस के बीच भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार पर कड़ी टिप्पणी की है. शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया कि आखिर पूरा तंत्र दवा निर्माताओं की मदद करने के लिए ही क्यों काम कर रहा है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने देश में दवाओं की कीमतों के मुद्दे पर दाखिल दो याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.
अदालत ने राष्ट्रीय औषधीय मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की कार्यप्रणाली पर निराशा जताते हुए इसे एक तरह से "पूरी तरह से निष्क्रिय" निकाय करार दिया. अदालत ने कहा कि सरकार की आंखों के सामने दवाओं के रिटेलर प्राइस और एमआरपी में इतना बड़ा अंतर बना हुआ है और क्या इस व्यवस्था को यूं ही बेलगाम छूट दी जानी चाहिए.
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया. उन्होंने अदालत को बताया कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया में सबसे कम में से हैं और सरकार की नीति पूरे तंत्र को पूरी तरह से नियंत्रित न करने की है. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है.
इससे पहले 12 अक्टूबर को हुई सुनवाई में भी कोर्ट ने कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को 30 फीसदी तक सीमित करने के केंद्र के फैसले को नाकाफी बताया था और सवाल किया था कि अन्य दवाओं के लिए ट्रेड मार्जिन की सीमा तय क्यों नहीं की जा सकती.
हालांकि, सरकार का कहना है कि कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय होने से मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी.