कैंसर की बायोसिमिलर दवा 'निवोलुमेब' की कीमत 1 लाख से घटकर 30 हजार रुपये हुई
महंगे कैंसर इलाज से परेशान मरीजों के लिए बड़ी राहत! भारत में निवोलुमेब का नया बायोसिमिलर पेश होने के बाद इम्यूनोथेरेपी की लागत में भारी गिरावट आई है. डॉक्टर अब अधिक मरीजों को यह प्रभावी इलाज दे पा रहे हैं, जिससे गंभीर कैंसर मामलों में भी जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ गई है.
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में कैंसर रोगियों के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है. देश में 'निवोलुमेब' (Nivolumab) नाम की इम्यूनोथेरेपी दवा का सस्ता बायोसिमिलर बाजार में आने से इसकी प्रति साइकिल कीमत 1 लाख रुपये से गिरकर लगभग 30,000 रुपये रह गई है. दवा की कीमतों में करीब 70% की इस गिरावट के बाद पिछले छह महीनों में डॉक्टरों द्वारा इसके प्रिस्क्रिप्शन में 50% से अधिक का इजाफा देखा गया है.
निवोलुमेब 'इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स' श्रेणी की एक महत्वपूर्ण दवा है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने में मदद करती है. डॉक्टरों के अनुसार, यह दवा 25 से अधिक प्रकार के ट्यूमर और लगभग 100 इंडीकेशन्स में काफी प्रभावी साबित होती है.
मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल और कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल के विशेषज्ञों का कहना है कि स्किन कैंसर (मेलेनोमा) और एडवांस्ड लंग कैंसर के मरीजों में इम्यूनोथेरेपी से जीवित रहने की दर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. यही नहीं, कोलोरेक्टल (आंत) कैंसर के शुरुआती मामलों में इस थेरेपी की मदद से मरीज बिना सर्जरी, केमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी के भी ठीक हो रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में बाजार में चार अन्य बायोसिमिलर आने से इसकी कीमतें 10,000 रुपये तक नीचे आ सकती हैं.
इसके अलावा, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा 137 कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को सीमित करने के फैसले से देश में मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी.
हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता भी जताई है कि अस्पतालों को इन सस्ती दवाओं को अपने इन-हाउस फार्मेसी में उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना होगा, ताकि इसका सीधा और वास्तविक लाभ मरीजों की जेब तक पहुंच सके.
क्या होती है बायोसिमिलर दवा?
बायोसिमिलर (Biosimilar) दवाएं मुख्य रूप से 'बायोलॉजिक्स' (Biologics) यानी जैविक दवाओं के समान बनाई जाने वाली दवाएं होती हैं. जैविक दवाएं रसायनों के बजाय जीवित कोशिकाओं, पौधों या जीवित जीवों से तैयार की जाती हैं, जिससे ये बेहद जटिल और महंगी होती हैं. जब किसी मूल जैविक दवा का पेटेंट (एकाधिकार) समाप्त हो जाता है, तो दूसरी कंपनियां उसी की तरह काम करने वाली और समान असरदार दवा बनाती हैं, जिसे बायोसिमिलर कहा जाता है. यह ठीक वैसे ही काम करती है जैसे साधारण दवाओं के लिए 'जेनेरिक दवाएं' काम करती हैं, लेकिन अपनी जटिल बनावट के कारण यह उनकी तुलना में अधिक उन्नत तकनीक से बनती है.
बायोसिमिलर से दवाइयों के दाम कम करने में कैसे मदद मिलती है?
मूल जैविक (Biologic) दवा को बनाने में शोध, रिसर्च, ट्रायल और पेटेंट हासिल करने में अरबों डॉलर का खर्च आता है, जिससे कंपनियां उन्हें काफी महंगी बेचती हैं. बायोसिमिलर बनाने वाली कंपनियों को शुरुआत से सारा शोध नहीं करना पड़ता, जिससे उनके निर्माण और टेस्टिंग की लागत काफी कम हो जाती है. जब बाजार में बायोसिमिलर दवाएं आती हैं, तो प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और मूल ब्रांडेड दवाओं के एकाधिकार को तोड़ती है. इसी प्रतिस्पर्धा और कम लागत के कारण कैंसर व अन्य गंभीर बीमारियों की महंगी इम्यूनोथेरेपी और बायोलॉजिक दवाओं के दाम 30% से लेकर 70% तक घट जाते हैं, जिससे यह आम मरीजों के लिए सस्ती और सुलभ हो जाती हैं.
आसान शब्दों में बायोसिमिलर दवा का अर्थ ऑफ-पेटेंट (Patent Off / Expired) जैविक दवा से ही है, लेकिन इसमें एक तकनीकी और महत्वपूर्ण अंतर होता है.
जब किसी मूल जैविक दवा (Biologic) का पेटेंट समाप्त हो जाता है, तब दूसरी कंपनियां उस जैसी ही दवा बनाने के लिए अधिकृत होती हैं; इसी ऑफ-पेटेंट संस्करण को बायोसिमिलर कहा जाता है. हालाँकि, इसे साधारण रासायनिक दवाओं की 'जेनेरिक' दवा से अलग समझा जाना चाहिए. साधारण दवाएं (जैसे पैरासिटामोल) रसायनों से बनती हैं और उनकी जेनेरिक कॉपी मूल दवा की 100% सटीक रासायनिक कार्बन कॉपी (Identical) होती है. इसके विपरीत, बायोलॉजिक दवाएं जीवित कोशिकाओं और जटिल बायोटेक्नोलॉजी से बनती हैं, इसलिए कोई भी कंपनी मूल दवा की 100% हूबहू कॉपी नहीं बना सकती. इसी कारण ऑफ-पेटेंट होने के बाद बनने वाली इन दवाओं को 'असाधारण रूप से समान और उतनी ही सुरक्षित व असरदार' होने के नाते 'बायोसिमिलर' (Biosimilar) कहा जाता है.