रवि, 25 अक्टू. 2026

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जस्टिस कौल का दावा: पूर्व CJI चंद्रचूड़ जजों की नियुक्ति में सरकार से लेते थे 'पूर्व-अनुमति'

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज संजय किशन कौल के नए खुलासे से न्यायिक गलियारों में खलबली मच गई है. अपनी किताब में उन्होंने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की कार्यशैली, जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकारी हस्तक्षेप और PMLA मामले से जुड़ी बातों को बेबाकी से उजागर किया है.

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25 अक्टू. 2026, 08:45 PM 3 मिनट में पढ़ें 27

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल

नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने अपनी आगामी आत्मकथा 'विदाउट फियर और फेवर' में देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. जस्टिस कौल का आरोप है कि पूर्व CJI चंद्रचूड़ जजों की नियुक्ति जैसे संवेदनशील प्रशासनिक मुद्दों पर सरकार के प्रति आवश्यकता से अधिक नरम और सहयोगात्मक रुख अपनाते थे.

वरिष्ठ पत्रकार करन थापर को दिए साक्षात्कार और अपनी पुस्तक के अंशों में जस्टिस कौल ने कॉलेजियम की एक बैठक का विशेष उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि छह रिक्त पदों को भरने के लिए पांच नामों पर पहले ही सहमति बन चुकी थी, लेकिन बैठक से ठीक पहले पूर्व CJI ने एक छठा नाम प्रस्तावित किया और कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले ही सरकार से दूरभाष पर राय या स्वीकृति लेने की इच्छा जताई. 

जस्टिस कौल ने स्पष्ट किया कि सरकार के साथ विचार-विमर्श और कॉलेजियम की बैठक से पूर्व 'पूर्व-स्वीकृति' लेने में बड़ा अंतर होता है, जिससे कॉलेजियम की स्वतंत्रता और गरिमा प्रभावित होती है.

जस्टिस कौल के अनुसार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कार्यकारी दबाव का विरोध करना अत्यंत आवश्यक है. उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ में बौद्धिक क्षमता और काम करने का जज्बा निसंदेह उत्कृष्ट था, परंतु प्रशासनिक फैसलों और नियुक्तियों के मामले में वे सरकार से जरूरत से ज्यादा चर्चा करते थे. यदि यह परिपाटी बन जाती है, तो कम कार्यकाल वाले भावी मुख्य न्यायाधीशों के लिए निष्पक्षता से काम करना और भी कठिन हो जाएगा.

अपनी किताब में जस्टिस कौल ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों का भी जिक्र किया है. उन्होंने बताया कि सेवानिवृत्ति के करीब मामले की सुनवाई को लेकर उठ रहे सवालों के बावजूद उन्होंने अपनी न्यायिक निष्ठा से समझौता नहीं किया और निष्पक्ष होकर सुनवाई आगे बढ़ाई. 

इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री-केंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था की ओर इशारा करते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों की तुलना में शीर्ष अदालत में मुख्य न्यायाधीश द्वारा अन्य वरिष्ठ जजों के साथ प्रशासनिक परामर्श की कमी रहती है.

पूर्व जज के इन दावों के सामने आने के बाद राजनीतिक पारा भी चढ़ गया है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है. कांग्रेस का कहना है कि पूर्व न्यायाधीश के ये खुलासे यह स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान शासनकाल में संवैधानिक संस्थाओं और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर किस प्रकार दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP