SC ने छत्तीसगढ़ के जज प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी को सही ठहराया
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ जज के खिलाफ आपराधिक मामले दायर करने वाले एक पूर्व ज्यूडिशियल ऑफिसर की याचिका को खारिज कर दिया. इस ऑफिसर को उनकी सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने मामले की सुनवाई की और टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता न केवल ज्यूडिशियल सेवा, बल्कि किसी भी सरकारी सेवा के लिए उपयुक्त नहीं हैं.
याचिकाकर्ता प्रभाकर ग्वाल छत्तीसगढ़ में ज्यूडिशियल ऑफिसर थे. उनकी पत्नी के माध्यम से तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ जज सहित कई व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक मामला दायर करने के बाद, फुल कोर्ट ने बिना जांच के उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की थी. ग्वाल ने इस बर्खास्तगी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सिंगल बेंच और डिवीजन बेंच दोनों ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया और बर्खास्तगी की पुष्टि की. इसके बाद, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
हाई कोर्ट का निर्णय
अगस्त 2020 में, हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने ग्वाल की रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने जानबूझकर कार्य किया, जिसके परिणामों से वे पूरी तरह वाकिफ थे. कोर्ट ने यह भी कहा कि फुल कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग करते हुए उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की थी, और इसके लिए रिकॉर्ड में पर्याप्त कारण मौजूद थे.
ग्वाल ने सिंगल बेंच के आदेश को डिवीजन बेंच में चुनौती दी, यह दावा करते हुए कि सिंगल बेंच ने अनुच्छेद 311 की गलत व्याख्या की और फैसला सुप्रीम कोर्ट के 12वें वरिष्ठतम जज को खुश करने के लिए दिया गया, जिनके खिलाफ उनकी पत्नी ने शिकायत दर्ज की थी.
ग्वाल ने यह भी तर्क दिया कि सिंगल बेंच का जज, जिसने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश करने वाली फुल कोर्ट मीटिंग में भाग लिया था, ने उनकी रिट याचिका की सुनवाई करके अनुचित तरीके से काम किया.
डिवीजन बेंच का फैसला
डिवीजन बेंच ने कहा कि ग्वाल की बर्खास्तगी केवल एक कार्य के कारण नहीं, बल्कि बार-बार गंभीर आरोप लगाने, अशोभनीय टिप्पणियों और दुर्भावनापूर्ण पत्राचार के कारण हुई, जो मुख्य न्यायाधीश, वरिष्ठ जजों और निचली ज्यूडिशियल सेवा के सहयोगियों के खिलाफ थे.
कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड में पर्याप्त कारण मौजूद थे, जिसके आधार पर फुल कोर्ट ने अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत बिना विभागीय जांच के बर्खास्तगी की सिफारिश की.
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच आमतौर पर दुराचार के आरोपों को संबोधित करने के लिए होती है, लेकिन इस मामले में ग्वाल का व्यवहार और आचरण ऐसा था कि हाई कोर्ट ने उन्हें ज्यूडिशियल सेवा के लिए अयोग्य माना.
सुप्रीम कोर्ट ने डिवीजन बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए ग्वाल की याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने पैरवी की.