बस्तर पंडुम की आड़ में पहाड़ों को खोदने की तैयारी- सोरी
छत्तीसगढ़ के बस्तर में सरकार द्वारा आयोजित बस्तर पंडुम का विरोध
बस्तर | संवाददाताः छत्तीसगढ़ में बस्तर पंडुम को लेकर सरकार ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है. यह आयोजित भले ही बस्तर में हो रहा है, पर इसको राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर का बनाने के लिए साय सरकार ने पूरी मशीनरी झोंक रखी है.
यूं तो एक पखवाड़े से जिला प्रशासन बस्तर पंडुम मना रहा है. राज्य गृह मंत्री विजय शर्मा से लेकर राज्यपाल रामेन डेका तक इस आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं और देश के गृहमंत्री अमित शाह भी इस आयोजन का हिस्सा बनने बस्तर पहुंच रहे हैं. अमित शाह के दौरे के चलते पिछले दो दिनों से राष्ट्रीय स्तर पर बस्तर पंडुम सुर्खियां बटोर रहा है.
लेकिन बस्तर में ही बस्तर पंडुम को लेकर विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं. दरअसल आयोजन की शुरुआत में ही आदिवासी समाज ने बस्तर पंडुम के इस सरकारी आयोजन को लेकर आपत्ति दर्ज की थी.
सरकार भले ही इस आयोजन को आदिवासी परंपरा व संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के रूप में प्रचारित कर रही है, लेकिन बस्तर और आदिवासियों की संस्कृति को जानने-समझने वाले समाजसेवी और समाज के पदाधिकारी इस सरकारी आयोजन को अलग नजर से ही देख रहे हैं.
आदिवासी कोया समाज के जिला अध्यक्ष बल्लू भवानी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ये बस्तर पंडुम नहीं है. पंडुम के नाम पर सरकार समाज की अस्मिता पर चोट कर रही है. इसका पूरा आदिवासी समाज विरोध करता है. समाज के पदाधिकारियों ने मंत्री रामविचार नेताम को लिखित में पत्र भी दिया है. विरोध का मतलब सड़क पर उतरना ही नहीं होता है.
बस्तर पंडुम के दौरान राम कथा पर सवाल उठाते हुए भवानी कहते हैं कि बस्तर में राम कथा का क्या मतलब है? बस्तर की प्राचीन कहानियों पर प्रकाश डालते अपने आप राम जुड़ जाते तो अलग बात है. यदि दण्डकारण्य में उन्होंने समय व्यतीत किया और विचरण किया है तो निश्चत तौर पर आदिवासी कहानी में वे शामिल होगें.
आपको बता दें कि बस्तर में आदिवासियों के नाम पर मनाये जा रहे उत्सव में सरकार ने कुमार विश्वास को राम कथा कहने के लिए आमंत्रित किया था.
जिला अध्यक्ष बल्लू भवानी आगे कहते हैं कि आयोजकों को पंडुम का अर्थ ही नहीं मालूम है, सिर्फ राजनीति हो रही है. आदिवासी हित की कोई बात नहीं करता है. आदिवासी संस्कृति सभ्यता की बात करने वाली सरकार कितना जान रही है.
पंडुम तो आदिवासियों की जीवन जीने की शैली है. इस कार्यक्रम में तो नाच-गाना चल रहा है.
बचेली में भी उठे विरोध के स्वर
विरोध के स्वर कई जगह उठ रहे हैं. मांझीपारा बचेली में आदिवासी समाज ने बस्तर पण्डुम शब्द के इस्तेमाल को लेकर नाराजगी जताई है. ग्राम वासियों के मुताबिक बस्तर में पंडुम शब्द का उपयोग सरकार, शासन-प्रशासन क्यों कर रहा है?
पंडुम का अर्थ अलग है. यह शब्द हम आदिवासियों के आराध्य एवं पूजन व जीवन शैली पर आधारित है. पण्डुम पुण्य और रक्षित शब्द है. इस शब्द के बिना आदिवासियों की जीवन शैली का संचालन दिशाहीन है. इस पंडुम शब्द का अपमान क्यों किया जा रहा है. इस शब्द का सरकारी आयोजनों में इस्तेमाल कतई सही नहीं है.
बचेली के मांझीपारा में बस्तर पंडुम के विरोध में सैकड़ों लोगों ने पूर्व विधायक मनीष कुंजाम बस्तरिया राज मोर्चा के बैनर तले किया है.
आदिवासियों को बहलाने-फुसलाने का आयोजन
सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी कहती हैं कि यहां बस्तर पंडुम नहीं मनाया जा रहा है. बल्कि इसकी आड़ में यहां सातों जिलों के आदिवासियों को एकत्र कर बहलाया-फुसलाया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि पंडुम के नाम पर पहाड़ों को खोदने की रणनीति सरकार और अधिकारी बना रहे हैं. पंडुम का अर्थ भी सरकार जानती है और सभी के समझ में भी आ रहा है. बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को पहाड़ सौंप दिये जायेंगे.
सोनी सोरी ने आरोप लगाया कि आदिवासी बहकावे में आ गए तो ठीक, जो नहीं मानेंगें तो उन्हें कथित मुठभेड़ के सहारे किनारे लगा दिया जाएगा.