इजराइल चुनाव: नेतन्याहू और विपक्ष दोनों बहुमत से दूर, अरब पार्टियों के रुख पर सत्ता की चाबी
इजराइल में आम चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर देश को राजनीतिक अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है. नेतन्याहू के गुट और विपक्षी गठबंधन में से किसी को भी जादुई आंकड़ा नहीं मिला है, जिससे अरब पार्टियों की भूमिका बेहद निर्णायक हो गई है.
यरूशलम । डेस्क: यरूशलम पोस्ट की खबर है कि इजराइल में हुए आम चुनाव के वोटों की गिनती लगभग अंतिम दौर में पहुंच गई है. सेंट्रल इलेक्शंस कमेटी द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, कुल वोटों में से 91 प्रतिशत से अधिक की गिनती पूरी हो चुकी है. अब तक सामने आए नतीजों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गुट ने बढ़त बना रखी है. हालांकि, देश की संसद 'नेसेट' में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत से दोनों ही प्रमुख राजनीतिक गुट काफी दूर नजर आ रहे हैं. इस अनिश्चित स्थिति ने इजराइल को एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है.
नेतन्याहू का गुट सबसे आगे, लेकिन जादुई आंकड़े से दूर
चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, 120 सीटों वाली नेसेट में बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है. नेतन्याहू की अपनी पार्टी लिकुड को 26 सीटें मिली हैं, जिससे वह एक बार फिर संसद में सबसे बड़े एकल दल के रूप में उभरी है. नेतन्याहू के सहयोगी दलों में यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म, शास और ओत्ज्मा येहुदित को सात-सात सीटें तथा रिलीजियस ज़ियोनिस्ट पार्टी को छह सीटें मिलने की संभावना है. हालांकि, यह गठबंधन 61 सीटों के स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से अभी 8 सीट दूर है. टीवी चैनलों द्वारा चुनाव पूर्व कराए गए सर्वेक्षणों की तुलना में लिकुड को अधिक सफलता मिली है, जबकि उसके सहयोगियों की सीटों में गिरावट दर्ज की गई है.
विपक्षी गठबंधन की उम्मीदों को झटका
दूसरी ओर, विपक्षी गुट को कुल 48 सीटों से ही संतोष करना पड़ता दिख रहा है. गादी ईसेनकोट की अगुवाई वाली याशर पार्टी 21 सीटों के साथ विपक्षी गुट में सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई है. नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली बी-याहाद पार्टी को 12 सीटें, याइर गोलन की द डेमोक्रैट्स को 8 सीटें और एविग्डोर लिबरमैन की यिसराइल बेतेनु को 7 सीटें मिलने का अनुमान है. चुनाव पूर्व एग्जिट पोल्स में विपक्षी गठबंधन को बढ़त दिखाई गई थी और याशर पार्टी के सबसे बड़े दल बनने की उम्मीद जताई गई थी, लेकिन वास्तविक नतीजों में यह रुझान पूरी तरह पलट गया.
निर्णायक मोड़ पर अरब पार्टियां और दोहरे लिफाफे वाले वोट
दोनों मुख्य गुटों के बहुमत से पीछे रहने के कारण अरब राजनीतिक दल इस बार सत्ता की असली चाबी बनते दिख रहे हैं. ऐतिहासिक रूप से उच्च मतदान के बल पर अरब दलों ने रिकॉर्ड 19 सीटों पर जीत हासिल की है. इनमें जॉइंट लिस्ट को 12 और राम पार्टी को 7 सीटें मिली हैं. फिलहाल सबकी नजरें उन दोहरे लिफाफे वाले मतपत्रों (डबल-एंवेलप बैलेट्स) की गिनती पर टिकी हैं, जो सैनिकों, अस्पताल के मरीजों और जेल के कैदियों द्वारा डाले जाते हैं. ये अंतिम वोट नतीजों का रुख बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. ओफ़र विंटर और योआज़ हेंडेल की छोटी पार्टियां न्यूनतम वोट प्रतिशत का दायरा पार करने में असमर्थ रही हैं, जिससे नेतन्याहू के लिए समीकरण और कठिन हो गए हैं.
गठबंधन को लेकर छिड़ी रार और राष्ट्रपति की अपील
चुनावी गतिरोध के बीच विपक्षी नेता याइर गोलन ने अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की वकालत की है. हालांकि, विपक्षी खेमे के अन्य प्रमुख नेताओं ने सुरक्षा कारणों से अरब दलों को सरकार में शामिल करने पर कड़ा एतराज जताया है. वहीं दूसरी तरफ, लिकुड पार्टी ने चुनाव में धोखाधड़ी के आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है. इस पूरे सियासी तनाव को देखते हुए राष्ट्रपति आइजैक हर्ज़ोग ने सभी राजनीतिक दलों से खुले दिमाग से बातचीत करने का आग्रह किया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि देश को किसी भी कीमत पर दोबारा चुनाव की स्थिति से बचाया जाना चाहिए.