बच्चे को परीक्षा के मद्देनज़र मां के तबादले पर अंतरिम रोक- HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक छात्र के शैक्षणिक भविष्य और करियर को सर्वोपरि मानते हुए उसकी माँ के स्थानांतरण आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है. न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू की एकल पीठ ने महिला एवं बाल विकास विभाग में पर्यवेक्षक के पद पर कार्यरत अल्पना दुबे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया.
अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्रिय परीक्षा चक्र के दौरान किसी अभिभावक का स्थानांतरण छात्र की पढ़ाई और मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है.
मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता अल्पना दुबे वर्तमान में बिलासपुर जिले के सीपत में एकीकृत बाल विकास परियोजना में पर्यवेक्षक के रूप में पदस्थ हैं. राज्य सरकार ने 6 मार्च 2026 को एक आदेश जारी कर उनका स्थानांतरण जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा प्रोजेक्ट में कर दिया था.
इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं, आर.एस. बघेल और आदित्य शर्मा ने दलील दी कि स्थानांतरण आदेश में किसी विशेष कारण का उल्लेख नहीं किया गया है. साथ ही, उन्होंने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता का पुत्र सेंट जेवियर्स हायर सेकेंडरी स्कूल, भरनी (बिलासपुर) में कक्षा 10वीं का छात्र है और वर्तमान में उसकी बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं.
सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं ने सीबीएसई (CBSE) की जून 2025 की उस नई नीति का हवाला दिया, जो छात्रों को अपने परिणाम सुधारने के लिए दो चरणों में परीक्षा देने का अवसर प्रदान करती है.
पहली मुख्य परीक्षा फरवरी-मार्च 2026 में संपन्न हो रही है, जबकि अंकों में सुधार के लिए दूसरी परीक्षा मई 2026 में आयोजित होना प्रस्तावित है.
याचिकाकर्ता का तर्क था कि यदि इस महत्वपूर्ण समय पर उन्हें नई जगह जॉइन करने के लिए मजबूर किया गया, तो उनके बच्चे को आगामी परीक्षाओं की तैयारी में भारी कठिनाई होगी, जिससे उसका पूरा शैक्षणिक करियर दांव पर लग सकता है.
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता आदित्य तिवारी ने तर्क दिया कि स्थानांतरण आदेश नियमानुसार जारी किया गया था और प्रतिबंध की अवधि के बावजूद इसके लिए आवश्यक अनुमोदन प्राप्त कर लिया गया था. हालांकि, सरकार की ओर से सीबीएसई की द्वि-चरणीय परीक्षा नीति और छात्र की वर्तमान स्थिति के दस्तावेजों पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई.
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 16 मार्च को अपने आदेश में कहा कि चूंकि छात्र के पास मई 2026 में दूसरे चरण की परीक्षा में बैठने का अवसर है, इसलिए उसे एक स्थिर वातावरण मिलना आवश्यक है.
न्यायमूर्ति साहू ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की वर्तमान पोस्टिंग के संबंध में तब तक 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखी जाए, जब तक कि उनके द्वारा दिए गए अभ्यावेदन पर विभाग द्वारा कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लिया जाता. यह आदेश उन सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिनके बच्चे बोर्ड परीक्षाओं के निर्णायक दौर में हैं.