मुस्लिम कानून में सिर्फ गिफ्ट डीड से वैध नहीं होगा 'हिबा'- छत्तीसगढ़ HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मुस्लिम कानून के तहत दिए जाने वाले उपहार यानी 'हिबा' की वैधता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल गिफ्ट डीड (उपहार पत्र) निष्पादित करने या उसका पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) करा लेने मात्र से ही हिबा कानूनी रूप से मान्य नहीं हो जाता.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 10 अगस्त 2026 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और प्रथम अपील को खारिज कर दिया.
अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत किसी भी हिबा को वैध मानने के लिए दाता द्वारा उपहार की स्पष्ट घोषणा, स्वीकारकर्ता द्वारा उसकी स्वीकृति और संपत्ति का वास्तविक तथा प्रभावी कब्जा (पजेशन) सौंपना अनिवार्य शर्तें हैं.
यह मामला रायपुर के रानी दुर्गावती वार्ड स्थित लगभग 1,500 वर्ग फीट की एक संपत्ति से जुड़ा हुआ था. मामले के अनुसार, संपत्ति के कथित मालिक ने 27 मार्च 2019 को चार लोगों के पक्ष में एक पंजीकृत गिफ्ट डीड निष्पादित की थी. इस गिफ्ट डीड को अदालत में चुनौती देते हुए वादियों ने तर्क दिया कि हिबा की आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी नहीं की गई थीं.
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि गिफ्ट डीड में केवल यह लिख देना कि कब्जा दे दिया गया है, वास्तविक कब्जे का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता. प्रकरण में वादी लंबे समय से उस संपत्ति के 370 वर्ग फीट के निर्मित हिस्से में रह रहे थे, जबकि प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहे कि गिफ्ट डीड के बाद उन्हें पूरी संपत्ति का वास्तविक भौतिक कब्जा सौंपा गया था.
इसके अलावा, अदालत ने अविभाजित या संयुक्त संपत्ति के उपहार से संबंधित 'मुशा सिद्धांत' पर भी विचार किया और कहा कि संपत्ति चार लोगों को संयुक्त रूप से दी गई थी, लेकिन उसमें उनके अलग-अलग हिस्सों को स्पष्ट रूप से तय नहीं किया गया था. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी.
'हिबा' और 'मुशा का सिद्धांत' क्या हैं?
मुस्लिम कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) में 'हिबा' का सीधा अर्थ 'उपहार' या 'दान' होता है. यह एक ऐसा कानूनी हस्तांतरण है जिसके तहत कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए अपनी चल या अचल संपत्ति का स्वामित्व बिना किसी वित्तीय प्रतिफल (बदले में पैसे या लाभ लिए बिना) के किसी अन्य व्यक्ति को तुरंत सौंप देता है. भारतीय साक्ष्य अधिनियम या संपत्ति अंतरण अधिनियम के सामान्य नियमों से इतर, मुस्लिम कानून में हिबा को केवल पंजीकृत डीड (गिफ्ट डीड) से वैध नहीं माना जाता.
किसी भी हिबा के पूर्ण और कानूनी रूप से मान्य होने के लिए तीन आवश्यक तत्वों (अर्कान) का होना अनिवार्य है: पहला, दाता द्वारा उपहार की स्पष्ट घोषणा (ईजाब); दूसरा, स्वीकारकर्ता द्वारा उस उपहार की स्पष्ट या निहित स्वीकृति (कब्बूल); और तीसरा, सबसे महत्वपूर्ण, दाता द्वारा स्वीकारकर्ता को संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा (कब्जा-ए-कामिल) सौंपना. जब तक कब्जा हस्तांतरित नहीं होता, तब तक केवल कागजी कार्रवाई से हिबा कानूनी रूप से अधूरा रहता है.
वहीं दूसरी ओर, 'मुशा का सिद्धांत' (Doctrine of Musha) हिबा से ही जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण नियम है जो अविभाजित या संयुक्त संपत्ति के उपहार से संबंधित है. अरबी भाषा में 'मुशा' का अर्थ 'उलझा हुआ', 'संयुक्त' या 'अविभाजित हिस्सा' होता है. इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई संपत्ति ऐसी है जिसे आसानी से विभाजित या अलग किया जा सकता है (जैसे कोई मकान, जमीन या दुकान), तो उसे बिना बांटे या बिना उसका विशिष्ट हिस्सा तय किए संयुक्त रूप से उपहार में देना 'फासिद' (अनियमित या दोषपूर्ण) माना जाता है.
कानून का यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि बाद में स्वामियों के बीच कब्जे या हिस्से को लेकर कोई भ्रम या विवाद न पैदा हो. हालांकि, यदि संपत्ति ऐसी है जिसे बांटा ही नहीं जा सकता (जैसे कोई छोटा सा कमरा या कुआं) या फिर उपहार देने के बाद सभी प्राप्तकर्ताओं के बीच उनके स्पष्ट हिस्से तय करके उन्हें अलग-अलग कब्जा सौंप दिया जाता है, तो मुशा के तहत वह हिबा वैध हो जाता है.