जर्मनी: शिक्षा में कटौती और बढ़ते सैन्य खर्च के खिलाफ सड़कों पर उतरे हजारों छात्र; 34 शहरों में प्रदर्शन
जर्मनी भर में छात्रों और युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखा. 'Gen Z Regelt' के आह्वान पर 34 शहरों में हजारों लोग एकत्र हुए और शिक्षा बजट में हो रही कटौती के साथ-साथ सेना पर बढ़ाए जा रहे सरकारी खर्च का कड़ा विरोध जताया.
नई दिल्ली । डेस्क: यूरोप भर में फैल रही छात्र विरोध प्रदर्शनों की लहर अब जर्मनी भी पहुंच गई है. देश के प्रमुख शहरों में हजारों युवा, छात्र और आम नागरिक सड़कों पर उतरकर सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं. राजधानी बर्लिन सहित देश के 34 से अधिक शहरों में जनरेशन ज़ेड के नेतृत्व में विशाल रैलियों का आयोजन किया गया है. बर्लिन के ऐतिहासिक ब्रांडेनबर्ग गेट के पास स्थित प्लाट्ज़ डेस 18 मर्ज़ पर शनिवार की दोपहर एक बड़ी भीड़ एकत्र हुई, जिसमें युवा छात्रों के साथ-साथ हर वर्ग के लोग शामिल दिखाई दिए.
इस विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन 'Gen Z Regelt' (जनरेशन ज़ेड सॉर्ट्स इट) नामक एक ढीले-ढाले गठबंधन द्वारा किया गया था. शनिवार सुबह तक फ्रैंकफर्ट, कोलोन, म्यूनिख और बर्लिन जैसे प्रमुख शहरों में लगभग 1,80,000 लोगों ने इन प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए पंजीकरण कराया था.
केवल बर्लिन में ही लगभग 12,000 लोग पंजीकृत थे, और कार्यक्रम शुरू होने के बाद भी लोग लगातार सभा स्थल पर पहुंचते रहे. प्रदर्शनकारियों की छह प्रमुख मांगें हैं, जिनमें जीवन-यापन की बढ़ती लागत, शिक्षा बजट में कटौती और सैन्य भर्ती जैसे मुद्दे शामिल हैं.
शिक्षा में बजटीय कटौती और महंगाई का विरोध
प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने सरकार पर शिक्षा प्रणाली की अनदेखी करने का आरोप लगाया. हनोवर से बर्लिन पहुंची 23 वर्षीय राजनीति विज्ञान की छात्रा वेरोनिका डिनटर ने बताया कि पढ़ाई के बढ़ते खर्चों के कारण उन्हें पार्ट-टाइम काम करना पड़ रहा है. उनका कहना है कि उच्च शिक्षा और सामाजिक सेवाओं के लिए मिलने वाले बजट में कटौती की जा रही है, जबकि जीवन-यापन का खर्च लगातार बढ़ रहा है. विश्वविद्यालय संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, संस्थान बंद हो रहे हैं और शिक्षकों की नौकरियां जा रही हैं. छात्रों का मानना है कि यह स्थिति वर्तमान सरकार की राजनीतिक विफलता का परिणाम है.
सैन्य खर्च और विदेश नीति पर गहराता आक्रोश
प्रदर्शनकारियों का गुस्सा इस बात पर भी है कि एक तरफ जहां शिक्षा और सामाजिक कल्याण के बजट घटाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार सेना पर अरबों यूरो खर्च कर रही है. बर्लिन में रहने वाली 24 वर्षीय छात्रा एम्मा हेमैन ने कहा कि सरकार की ये नीतियां युवाओं के जीवन स्तर को सीधे प्रभावित कर रही हैं. छात्रों का आरोप है कि चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की सरकार बुनियादी ढांचे को सुधारने के बजाय सैन्य बजट बढ़ाने और गज़ा में जारी संघर्ष के वित्तपोषण में पैसे लगा रही है.
प्रदर्शनकारियों का गुस्सा इस बात पर भी है कि एक तरफ जहां शिक्षा और सामाजिक कल्याण के बजट घटाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार सेना पर अरबों यूरो खर्च कर रही है. बर्लिन में रहने वाली 24 वर्षीय छात्रा एम्मा हेमैन ने कहा कि सरकार की ये नीतियां युवाओं के जीवन स्तर को सीधे प्रभावित कर रही हैं.
पूरे यूरोप में छात्र आंदोलनों का असर
जर्मनी का यह प्रदर्शन यूरोप के अन्य हिस्सों जैसे फ्रांस, बेल्जियम, इटली, स्पेन और सर्बिया में हाल के हफ्तों में हुए छात्र आंदोलनों से प्रेरित दिखता है. यूनिवर्सिटी ऑफ कॉन्स्टैंज के फ्यूचर ऑफ वर्क लैब के वरिष्ठ शोधकर्ता किलियन हैम्पेल के अनुसार, युवाओं में निराशा वर्षों से जमा हो रही थी. यूरोपीय स्तर पर उठ रही यह लहर युवाओं को अपनी समस्याओं को सड़कों पर उठाने का हौसला दे रही है. उन्होंने माना कि शैक्षणिक ढांचे की बदहाली को लेकर छात्रों की चिंताएं जायज हैं और सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए.
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और तनाव की छिटपुट घटनाएं
बर्लिन में प्रदर्शन की शुरुआत शांत माहौल में हुई, जहां एंटी-फासीवादी कार्यकर्ताओं और छात्रों से लेकर 'ओमास गेगेन रेख्ट्स' (राइट-विंग के खिलाफ दादी) के बैज पहने बुजुर्ग महिलाएं भी एकजुट दिखीं. हालांकि, पश्चिमी शहर कोलोन में मार्च को रोकने की कोशिश के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं.
पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक हलकों में हिंसा की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हिंसा की बातें फैलाकर उनके असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है. छात्रों ने पुलिस से शांति बनाए रखने और हिंसा न करने की अपील की है.