कस्टडी में यातना: राजनांदगांव में वृद्धा की हत्या के संदेह में 2 पोते पीटे गए
राजनंदगांव । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव जिले में पुलिस पूछताछ के दौरान हिरासत में बर्बरता का एक गंभीर मामला सामने आया है. एक 70 वर्षीय महिला की हत्या की जांच के सिलसिले में पूछताछ के लिए बुलाए गए दो भाइयों ने पुलिसकर्मियों पर कस्टडी में बेरहमी से मारपीट करने और झूठा जुर्म कबूलवाने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है. पीड़ितों ने मामले की शिकायत जिले के पुलिस अधीक्षक से की है.
मिली जानकारी के अनुसार, घटना घुमका थाना क्षेत्र के बरबसपुर गांव की है. बीते वर्ष 13 नवंबर को गांव में 70 वर्षीय बिहासीन साहू का जला हुआ शव धान के पैरा के ढेर में मिला था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ था कि महिला की हत्या करने के बाद उसके शव को जलाया गया था. इस मामले में पुलिस बिहासीन साहू के बेटे नेत्रम साहू और पोतों पवन साहू तथा प्रदीप साहू को संदिग्ध मानकर जांच कर रही है.
पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस ने 18 अगस्त की सुबह तीनों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया था और 20 अगस्त की शाम तक उन्हें हिरासत में रखा. इस दौरान परिजनों या वकील से भी मिलने नहीं दिया गया.
शिकायत में कहा गया है कि थाने में 10 से 12 पुलिसकर्मियों ने पवन और प्रदीप की बेरहमी से पिटाई की ताकि वे हत्या का जुर्म कबूल कर लें. बाद में दोनों को घायल अवस्था में गांव के बाहर छोड़कर पुलिसकर्मी चले गए, जिसके बाद परिजनों ने उन्हें मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया.
परिवार का दावा है कि घटना वाले दिन वे तीनों किसी रिश्तेदारी में शादी के लिए लड़की देखने दूसरे गांव गए हुए थे और उन्हें घटना की जानकारी फोन पर मिली थी. परिजनों का आरोप है कि पुलिस असली दोषियों को पकड़ने के बजाय उन्हें ही इस मामले में फंसाने की कोशिश कर रही है.
मामले पर राजनंदगांव के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कीर्तन राठौर ने बताया कि तीनों लोग हत्या के मामले में संदिग्ध हैं और उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया था. उन्होंने कहा कि मामले की जांच जारी है और हिरासत में मारपीट के आरोपों की भी अलग से जांच की जा रही है.
गौरतलब है कि भारत में पुलिस हिरासत के दौरान नागरिकों के पास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS), भारतीय संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों के तहत कई महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं, ताकि कस्टोडियल टॉर्चर और पुलिस की मनमानी को रोका जा सके.
गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान नागरिक के अधिकार
पूछताछ और वकील से मिलने का अधिकार: हिरासत के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से मिलने का कानूनी अधिकार प्राप्त है. संविधान का अनुच्छेद 22(1) और BNSS की धारा 38 यह सुनिश्चित करती है कि संदिग्ध या अभियुक्त को कानूनी सलाह लेने से नहीं रोका जा सकता.
परिजनों को सूचना देने का अधिकार: BNSS की धारा 36 के अनुसार, पुलिस की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह व्यक्ति की गिरफ्तारी या हिरासत में रखे जाने की जानकारी उसके किसी परिजन, रिश्तेदार या मित्र को तुरंत प्रदान करे.
24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुति: संविधान के अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 के तहत, किसी भी व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता. यात्रा में लगने वाले समय को छोड़कर, 24 घंटे के भीतर उसे नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है.
चिकित्सीय परीक्षण (मेडिकल जांच) का अधिकार: BNSS की धारा 53 के तहत, हिरासत में लिए गए व्यक्ति का सरकारी डॉक्टर से मेडिकल परीक्षण कराना अनिवार्य है. यदि हिरासत में मारपीट हुई है, तो व्यक्ति मेडिकल जांच की मांग कर सकता है ताकि शरीर पर लगी चोटें आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हो सकें.
कस्टोडियल टॉर्चर और यातना के खिलाफ कानूनी नियम
डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (ऐतिहासिक दिशा-निर्देश): सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बासु मामले में कस्टडी में होने वाली हिंसा को रोकने के लिए सख्त नियम तय किए हैं. इसके तहत पूछताछ करने वाले पुलिस अधिकारियों का स्पष्ट पहचान पत्र (नेम टैग) होना चाहिए, गिरफ्तारी का मेमो तैयार होना चाहिए, और थाने में इंट्रोगेशन रूम में सीसीटीवी कैमरे होने चाहिए.
स्वीकारोक्ति की अमान्यता: भारतीय साक्ष्य अधिनियम (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023) के तहत पुलिस के सामने दिया गया बयान या कुबूलनामा अदालत में सबूत के रूप में मान्य नहीं होता. पुलिस दबाव या मारपीट कर जो जुर्म कबूल करवाती है, उसकी कानूनी अहमियत शून्य होती है.
भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत सजा: यदि कोई पुलिस अधिकारी बयान या जुर्म कबूलवाने के लिए किसी व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक यातना देता है, तो BNS की संबंधित धाराओं के तहत दोषी पुलिसकर्मी पर आपराधिक मामला दर्ज होता है और उसे कठोर कारावास की सजा हो सकती है.
अधिकारों के उल्लंघन पर शिकायत के माध्यम
कस्टोडियल टॉर्चर या अवैध हिरासत की स्थिति में पीड़ित या उसका परिवार सीधे जिला मजिस्ट्रेट (DM), संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक (SP), या उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है. इसके अलावा, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राज्य मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, जो कस्टोडियल हिंसा पर सख्त संज्ञान लेते हैं.