मनेन्द्रगढ़ के गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क में दर्शकों की भीड़
अंबिकापुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़ में स्थित गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क ने मात्र चार महीनों में 8,000 पर्यटकों को आकर्षित किया है, जिसमें पड़ोसी राज्यों के पर्यटक भी शामिल हैं. 28 अप्रैल को खुलने के बाद से यह पार्क तेजी से एक प्रमुख पर्यटक स्थल बन गया है, खासकर ऑफ-सीजन में जब गर्मी और मानसून के कारण पर्यटकों की संख्या आमतौर पर कम रहती है. मध्य प्रदेश के अनुपपुर, रीवा, शहडोल और कटनी जैसे जिलों से भी पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं.
यह पार्क 290 मिलियन वर्ष पुराने समुद्री जीवाश्मों का घर है, जो पहले असुरक्षित और उपेक्षित था. छत्तीसगढ़ वन विभाग ने इसे संरक्षित करने और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का कार्य शुरू किया.
गुजरात और झारखंड के डायनासोर जीवाश्म पार्कों की तर्ज पर विकसित इस पार्क में हसदेव नदी के किनारे प्राकृतिक ग्रेनाइट चट्टानों को प्राचीन प्राणियों के कलात्मक रूप में तराशा गया है. 35 प्रागैतिहासिक स्थलीय, जलीय और उभयचर प्राणियों की मूर्तियां बड़े पत्थरों पर बनाई गई हैं, जो आगंतुकों को पृथ्वी पर कभी मौजूद विशाल प्रजातियों की झलक देती हैं.
यह छत्तीसगढ़ का पहला रॉक गार्डन है. पार्क में एक व्याख्या केंद्र भी है, जहां जीवाश्म चट्टानों को देखा जा सकता है, चित्रों के माध्यम से जीवाश्म निर्माण की प्रक्रिया समझी जा सकती है और पृथ्वी के लाखों वर्षों के विकास पर वीडियो प्रदर्शन देखे जा सकते हैं.
इसके अलावा, एक कैक्टस गार्डन, बांस सेटम और प्राचीन पौधों को भी विकसित किया गया है. प्रकृति पथ, बांस राफ्टिंग और हसदेव नदी में नौकायन जैसी गतिविधियां भी नियोजित हैं, हालांकि मानसून के कारण ये फिलहाल निलंबित हैं.
डीएफओ के अनुसार, गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क एशिया का सबसे बड़ा समुद्री जीवाश्म स्थल है, जो हसदेव नदी के किनारे एक किलोमीटर में फैला हुआ है. इसे भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ऑफ इंडिया ने राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल घोषित किया है.
यहां बाइवैल्व्स, गैस्ट्रोपॉड्स, ब्रैकियोपॉड्स, क्रिनॉइड्स और ब्रायोजोआंस के जीवाश्म पाए गए हैं. 1954 में कोयला खनन के दौरान भूवैज्ञानिक एस.के. घोष द्वारा पहली बार खोजे गए इन जीवाश्मों की पुष्टि 2015 में लखनऊ के बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान द्वारा की गई.
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह क्षेत्र पर्मियन युग में समुद्र में डूबा हुआ था, और हिमनदों के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ने के कारण समुद्री जीव चट्टानों में दबकर लाखों वर्षों में जीवाश्म बन गए. आज यह पार्क गोंडवाना सुपरकॉन्टिनेंट के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है.