हाईकोर्ट से पत्नी की हत्या का दोषी व्यक्ति बरी
HC से पत्नी की हत्या का दोषी व्यक्ति बरी
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जांच और अभियोजन एजेंसियों की गंभीर खामियों का हवाला देते हुए पत्नी की हत्या के दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत का दोषसिद्धि का फैसला अविश्वसनीय मृत्यु-पूर्व बयान पर आधारित था.
40 वर्षीय सीताराम रवि को 27 नवंबर, 2024 को रामानुजगंज के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (क्रूरता) और 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराया था. उन्हें हत्या के लिए आजीवन कारावास और क्रूरता के लिए दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी.
निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में सीताराम के बड़े भाई सहित छह अन्य पारिवारिक सदस्यों को बरी कर दिया था.
अभियोजन पक्ष का मामला था कि सीताराम ने 2 मई, 2019 को दहेज विवाद के बाद अपनी पत्नी सुनीता को कथित तौर पर आग लगा दी थी. सुनीता को अस्पताल में भर्ती कराया गया और 28 मई, 2019 को छुट्टी दी गई.
उनकी मृत्यु 10 जुलाई, 2019 को सेप्टिसीमिया के कारण हुई. निचली अदालत ने 21 मई, 2019 को एक डिप्टी तहसीलदार द्वारा कथित तौर पर दर्ज किए गए मृत्यु-पूर्व बयान पर भरोसा किया.
हालांकि, हाईकोर्ट ने मृत्यु-पूर्व बयान में कई खामियां बताईं. अदालत ने कहा कि बयान दर्ज करने से पहले कोई चिकित्सा अधिकारी ने यह प्रमाणित नहीं किया कि मृतका बयान देने की मानसिक स्थिति में थी.
जिस डॉक्टर ने कथित तौर पर उसकी मानसिक स्थिति की पुष्टि की थी, उसे निचली अदालत में जांचा नहीं गया. डिप्टी तहसीलदार ने स्वयं क्रॉस-एग्जामिनेशन में स्वीकार किया कि दस्तावेज पर समय और तारीख में विसंगतियां थीं.
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि मृतका के बच्चों और अन्य गवाहों ने गवाही दी कि सुनीता के कपड़े खाना बनाते समय आग पकड़ गए थे. उन्होंने सुनीता और उनके पति के बीच किसी विवाद से इनकार किया.
अदालत ने कहा कि सुनीता की मृत्यु, जो घटना के दो महीने बाद सेप्टिसीमिया से हुई, को सीताराम द्वारा कथित तौर पर दी गई चोटों से सीधे तौर पर जोड़ा नहीं जा सकता.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने सीताराम की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया और उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. अदालत ने निर्देश दिया कि यदि सीताराम की किसी अन्य मामले में आवश्यकता न हो, तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाए.
हालांकि, उन्हें आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 437-ए के प्रावधानों के अनुसार 25,000 रुपये का निजी मुचलका और दो जमानतदारों के साथ जमानत देनी होगी.
हाईकोर्ट ने अभियोजन और निचली अदालतों को सतर्कता बरतने की चेतावनी भी दी.
अदालत ने छोटन साव बनाम बिहार राज्य और गुजरात राज्य बनाम किशनभाई के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जांच और अभियोजन एजेंसियों की खामियां न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करती हैं और इससे बरी होने की स्थिति बन सकती है.
फैसले की एक प्रति छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भेजी गई है, ताकि सभी हितधारकों के बीच इसका प्रसार किया जाए और अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो.
अदालत ने जोर दिया कि गंभीर अपराधों को दृढ़ता से निपटाया जाना चाहिए ताकि कानून का शासन बना रहे.
हाईकोर्ट ने कहा, "अभियोजन एजेंसी की घोर विसंगतियां और लापरवाही पूरी तरह अस्वीकार्य हैं. निचली अदालतों को अभियोजन और जांच एजेंसियों के कार्यों पर सतर्कता से निगरानी रखने का आदेश दिया जाता है ताकि अभियुक्तों को अभियोजन की लापरवाही से अनुचित लाभ न मिले, जिससे निष्पक्ष और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो और कानून के शासन और उचित प्रक्रिया की पवित्रता बनी रहे."