पति से तलाक की बात छिपाना धोखाधड़ी नहीं, अगर धोखा देने की नीयत न हो: HC
बिलासपुर । संवादाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी (धारा 420 IPC) और द्विविवाह (धारा 494 IPC) के आरोप से घिरी एक महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को निरस्त कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 12 अगस्त 2026 को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल वैवाहिक स्थिति से जुड़ी कोई बात न बताना तब तक धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता, जब तक कि धोखा देने और बेईमानी से प्रेरित करने का इरादा साबित न हो.
यह मामला बिलासपुर की एक महिला और रायपुर निवासी उसके पति के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा था. महिला के पहले विवाह का मामला बिलासपुर के पारिवारिक न्यायालय में लंबित था, जिसने 28 जनवरी 2023 को डिक्री जारी कर पहले विवाह को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया था. महिला का कहना था कि उसके दूसरे पति और उसके परिवार को उसके पहले विवाह और तलाक की प्रक्रिया की पूरी जानकारी थी.
वैवाहिक अनबन के बाद महिला ने महिला थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. इसके जवाब में पति ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत रायपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष याचिका लगाई थी. मजिस्ट्रेट ने 24 जुलाई 2024 को पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया, जिसके बाद न्यू राजेंद्र नगर पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कर आरोप-पत्र दाखिल किया गया था.
महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी कि उसने कोई तथ्य नहीं छिपाया और यह मामला केवल बदले की भावना से दर्ज कराया गया है. हालांकि राज्य सरकार और पति के वकील ने याचिका का विरोध किया, लेकिन हाईकोर्ट ने जांच में एकत्र सामग्री को अपर्याप्त पाया.
सुप्रीम कोर्ट के 'हृदय रंजन प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य' मामले के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जांच से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो सके कि पति ने महिला के किसी धोखे में आकर अपनी कोई संपत्ति या धन उसे दिया हो. इसके साथ ही अदालत ने द्विविवाह के आरोपों को भी निराधार मानते हुए महिला के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को खारिज कर दिया.