रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

ममता बनर्जी को चुनौती देने वाले ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं ?

C

CG Khabar

04 जून 2026, 08:30 AM 4 मिनट में पढ़ें 3

 ऋतब्रत बनर्जी
ऋतब्रत बनर्जी

कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है. विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन तो हुआ ही, लेकिन अब मुख्य विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक ऐसी बगावत खड़ी हो गई है जिसने पार्टी के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा दिया है. तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित किए जाने के ठीक दो दिन बाद पहली बार विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी ने बंगाल की राजनीति के 'एकनाथ शिंदे' के रूप में खुद को स्थापित कर लिया है. 


पार्टी के कुल 80 विधायकों में से कम से कम 58 'बागी' विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में अपना नेता चुन लिया है. इन विधायकों का दावा है कि वही 'असली' तृणमूल कांग्रेस विधायी दल हैं. इस कदम के साथ ही बागियों ने ममता बनर्जी की ओर से आधिकारिक तौर पर नामित शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नेतृत्व को पूरी तरह खारिज कर दिया है.

विज्ञापन


ममता के 29 साल के इतिहास में पहली बार ऐसी चुनौती


ममता बनर्जी ने लगभग 29 साल पहले कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ बगावत करके तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी. इन तीन दशकों के इतिहास में यह पहला मौका है जब ममता बनर्जी को अपनी ही पार्टी के भीतर इस स्तर की बगावत का सामना करना पड़ रहा है. 


इससे पहले जिसने भी ममता के खिलाफ जाने की जुर्रत की, उसे या तो राजनीति छोड़नी पड़ी या फिर घुटने टेकने पड़े. लेकिन ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में हुए इस विद्रोह ने इतिहास बदल दिया है. विधानसभा में खुद को असली और मुख्य विपक्ष बताते हुए ऋतब्रत ने एक दिलचस्प राजनीतिक दांव भी खेला है. उन्होंने ममता बनर्जी से सार्वजनिक रूप से अनुरोध किया है कि वह इस विधायी दल की मुख्य सलाहकार की भूमिका स्वीकार करें.


'बिल्ली के गले में घंटी' बांधने का पुराना इतिहास


यह पहला मौका नहीं है जब ऋतब्रत बनर्जी ने अपनी ही पार्टी के नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोला हो. उनके राजनीतिक करियर में 'बिल्ली के गले में घंटी' बांधने का इतिहास काफी पुराना है. ठीक नौ साल पहले, जून 2017 में उनके पुराने दल माकपा (CPM) ने भी उन्हें "पार्टी विरोधी गतिविधियों" के आरोप में निलंबित किया था और बाद में निष्कासित कर दिया था. तब ऋतब्रत माकपा के राज्यसभा सांसद थे और उन्होंने प्रकाश करात, वृंदा करात और मोहम्मद सलीम जैसे कद्दावर नेताओं के गुट के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई थी. 


इस बार भी तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के उस खुलासे के बाद बगावत तेज की, जिसमें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम के प्रस्ताव पर 14 विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप लगाया गया था. इस मामले की जांच सीआईडी कर रही है और जांच के तार तृणमूल के दूसरे सबसे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी के दरवाजे तक पहुंच गए हैं.


वामपंथ के 'युवा सितारे' से तृणमूल के संकट तक का सफर


ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था. एक समय वह बुद्धदेव भट्टाचार्य और सीताराम येचुरी की आंखों के तारे हुआ करते थे. वह एसएफआई (SFI) के अखिल भारतीय महासचिव थे और दिल्ली की राजनीति में अंग्रेजी और हिंदी पर अपनी पकड़ के कारण वामपंथ का एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे थे. कम उम्र में ही उन्हें राज्यसभा भेजा गया था. 


हालांकि, स्वभाव से बेहद महत्वाकांक्षी और नेतृत्व के करीब रहने की कला में माहिर ऋतब्रत का माकपा से मोहभंग होने के बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था. तृणमूल ने उन्हें 2024 में जवाहर सरकार की जगह राज्यसभा भेजा और 2026 के विधानसभा चुनाव में हावड़ा की उलुबेरिया पुरबा सीट से मैदान में उतारा. 


लेकिन तृणमूल के भीतर अभिषेक बनर्जी और चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक (I-PAC) के बढ़ते दखल, पार्टी के 'कॉर्पोरेटाइजेशन' और भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर उनका असंतोष लगातार बढ़ता गया और आखिरकार यह इस बड़ी बगावत के रूप में सामने आया.


क्या दांव पर लग जाएगा पार्टी का चुनाव चिन्ह?


महाराष्ट्र में जिस तरह शिवसेना के एकनाथ शिंदे और राकांपा के अजीत पवार के हक में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए उन्हें असली पार्टी और चुनाव चिन्ह आवंटित किया था, उसी तर्ज पर अब बंगाल में भी 'असली तृणमूल' की लड़ाई लंबी खिंचने के आसार हैं. 


हालांकि, ममता बनर्जी आसानी से हार मानने वाली नेता नहीं हैं और जब पार्टी के चुनाव चिन्ह (जोड़ा फूल) की लड़ाई चुनाव आयोग और अदालतों तक पहुंचेगी, तो वह पूरी ताकत से मुकाबला करेंगी. 


दिलचस्प बात यह है कि जिस तृणमूल कांग्रेस ने पिछले 15 वर्षों के शासनकाल में अन्य दलों में दलबदल को बढ़ावा दिया और दलबदल विरोधी कानून को कमजोर बनाए रखा, आज वही पार्टी इस कानून के सहारे कोई राहत पाने की स्थिति में नहीं दिख रही है क्योंकि बागी विधायकों की संख्या दो-तिहाई के जादुई आंकड़े को पार कर चुकी है. 


विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी है, और इस बगावत ने पार्टी के भविष्य पर एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP