फ्रांस में सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे साढ़े पांच लाख प्रदर्शनकारी
शुरुआत में छात्रों ने स्कूलों की जर्जर इमारतों, कक्षाओं में बढ़ती भीड़ और शिक्षकों की कमी के खिलाफ आवाज उठाई थी. लेकिन देखते ही देखते इस आंदोलन में देश का हर वो वर्ग शामिल हो गया जो गिरती सार्वजनिक सेवाओं, बढ़ती महंगाई और अनिश्चित भविष्य से परेशान है.
पेरिस । डेस्क: फ्रांस की राजधानी पेरिस का प्लेस डी ला रिपब्लिक शनिवार को धुएं और आंसुओं के गुबार से भर उठा. देश की स्वतंत्रता और गणराज्य का प्रतीक मानी जाने वाली 'मैरिएन' की मूर्ति के पैरों में बैठकर हजारों युवाओं ने सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की. शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ छात्रों का यह आंदोलन अब एक व्यापक जन-आक्रोश में बदल चुका है, जिसने पूरे फ्रांस को हिलाकर रख दिया है.
छात्र आंदोलन से उठी चिंगारी बनी जनांदोलन
सितंबर के मध्य में पेरिस के उपनगरीय इलाके क्रेतेइल के एक हाई स्कूल से शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब एक महीने से अधिक समय से जारी है. शुरुआत में छात्रों ने स्कूलों की जर्जर इमारतों, कक्षाओं में बढ़ती भीड़ और शिक्षकों की कमी के खिलाफ आवाज उठाई थी. लेकिन देखते ही देखते इस आंदोलन में देश का हर वो वर्ग शामिल हो गया जो गिरती सार्वजनिक सेवाओं, बढ़ती महंगाई और अनिश्चित भविष्य से परेशान है. इस प्रदर्शन में नर्सें, वकील, अग्निशामक, शिक्षक और 2018 के चर्चित 'येलो वेस्ट' आंदोलन के सदस्य भी एकजुट होकर सड़कों पर उतर आए हैं.
हिंसा और झड़पों से दहला फ्रांस
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में लगभग 5,50,000 लोगों ने इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, जिनमें से अकेले पेरिस में 1,10,000 लोग सड़कों पर थे. दोपहर होते-होते शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तनाव बढ़ गया. प्रदर्शनकारियों और दंगारोधी पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुईं. पेरिस में गाड़ियों और अखबार के स्टॉल में आग लगा दी गई, जबकि मार्सिले में प्रदर्शनकारियों ने टाउन हॉल में घुसकर दुकानों में लूटपाट की. अधिकारियों ने बताया कि हिंसा और तोड़फोड़ के आरोप में देशभर से 400 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
महंगाई और बजट संकट से गहराया असंतोष
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह जन-आक्रोश केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के गहरे आर्थिक संकट का परिणाम है. फ्रांस इस समय भारी राष्ट्रीय कर्ज और बजट घाटे से जूझ रहा है. सरकार सार्वजनिक खर्चों में कटौती करने की कोशिश कर रही है, जिससे जनता को मिलने वाली सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं. आम नागरिक यह सवाल उठा रहे हैं कि भारी टैक्स देने के बावजूद देश किस दिशा में जा रहा है.
मैक्रों सरकार के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कार्यकाल के अंतिम चरण में हो रहे इन प्रदर्शनों ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया है. आंदोलनकारी इसे एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं, वहीं सरकार के पास जनता के इस असंतोष को शांत करने का कोई आसान रास्ता नजर नहीं आ रहा है. आगामी चुनावों से ठीक पहले देश में बढ़ रही यह राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता मैक्रों प्रशासन के लिए एक बेहद गंभीर परीक्षा बन चुकी है.