MGNREGA की जगह VB-G RAM G बिल: विपक्षी बोले- राज्यों पर बढ़ेगा वित्तीय बोझ
नई दिल्ली । डेस्क: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को निरस्त करने और 'विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB–G RAM G) बिल, 2025' को लागू करने की तैयारी है. जिसका बिल सोमवार को लोकसभा में पेश होने वाली पूरक कार्यसूची में सूचीबद्ध किया गया. यह प्रस्तावित कानून ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिन के वैतनिक रोजगार की सांविधिक गारंटी देने का लक्ष्य रखता है, जिसे सरकार "विकसित भारत 2047" के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ ग्रामीण विकास ढांचे को संरेखित करने" के रूप में देखती है.
हालांकि, इस कदम ने विपक्षी नेताओं की ओर से कड़ी आलोचना को जन्म दिया है. उनका आरोप है कि यह प्रस्तावित कानून MGNREGA के अधिकार-आधारित ढांचे को कमजोर करता है और वित्तीय बोझ को राज्यों पर डालता है.
सीपीएम के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिट्टास ने आरोप लगाया कि नया बिल 'अधिकार-आधारित गारंटी कानून की आत्मा को निकाल' कर एक 'शर्तों पर आधारित, केंद्र नियंत्रित योजना' ला रहा है जो राज्यों और श्रमिकों के खिलाफ है. उन्होंने बिल में कई खामियाँ बताईं:
ब्रिट्टास ने कहा कि MGNREGA में अकुशल मजदूरी के लिए 100% केंद्रीय फंडिंग होती थी, जबकि VB-G RAM G में राज्यों को 40% खर्च वहन करना होगा, जिससे राज्यों पर लगभग ₹50,000+ करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. उन्होंने इसे "चुपके से लागत-स्थानांतरण" बताया.
उनका कहना है कि MGNREGA की मांग-आधारित प्रकृति को केंद्र के पूर्व-निर्धारित 'मानक आवंटन और सीमा' से बदल दिया जाएगा, जिससे फंड खत्म होने पर श्रमिकों के अधिकार खत्म हो जाएंगे.
उन्होंने ग्राम पंचायतों को दरकिनार करने और जीआईएस टूल, पीएम गति शक्ति लेयर्स, और एआई ऑडिट जैसे केंद्रीकृत डिजिटल स्टैक को अनिवार्य बनाने की आलोचना की. उनके अनुसार, इससे स्थानीय प्राथमिकताओं को नजरअंदाज किया जाएगा और तकनीकी विफलताओं के कारण लाखों श्रमिक बहिष्कृत हो सकते हैं.
ब्रिट्टास ने उस प्रावधान की भी आलोचना की जो कृषि मौसमों के नाम पर सालाना 60 दिनों तक काम को निलंबित करने की अनुमति देता है, जिसे उन्होंने "राज्य-प्रबंधित श्रम आपूर्ति" बताया, जो श्रमिकों के विकल्प और गरिमा को छीनता है.
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाने के औचित्य पर सवाल उठाया और कहा कि नाम बदलने से कार्यालयों और स्टेशनरी पर पैसा बर्बाद होगा, जिसका कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं है.
ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष कांग्रेस सांसद सप्तगिरी उलका ने कहा कि सरकार हमेशा से MGNREGS को खत्म करना चाहती थी, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'गड्ढे खोदने की योजना' कहा था. उन्होंने महात्मा गांधी का नाम हटाने पर भी आपत्ति जताई.
तृणमूल नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने इस कदम को "महात्मा गांधी का अपमान" बताया.
सीपीएम महासचिव एम.ए. बेबी ने आरोप लगाया कि यह बदलाव MGNREGA के मूल अधिकार-आधारित ढांचे को नष्ट करने और केंद्रीय हिस्सेदारी को कम करने का प्रयास है, जिससे केंद्र अब विपक्षी शासित राज्यों को आवंटन में कटौती करके दंडित कर सकेगा.
ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि MGNREGA ने 20 वर्षों में गारंटीकृत रोजगार प्रदान किया है, लेकिन व्यापक सामाजिक सुरक्षा हस्तक्षेपों और सरकारी योजनाओं के संतृप्ति-उन्मुख कार्यान्वयन के कारण ग्रामीण परिदृश्य में हुए महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के मद्देनजर "आगे मजबूती आवश्यक हो गई है."