गरीबों की झोपड़ी तोड़ने वाले डिप्टी कलेक्टर को बनाया उप तहसीलदार
नई दिल्ली | डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने गरीबों की झोपड़ी तोड़ने वाले डिप्टी कलेक्टर को डिमोट कर के उप तहसीलदार बनाने का निर्देश दिया है. इस डिप्टी कलेक्टर पर 1 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है.
मामला आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले का है, जहां चार लोगों ने राजस्व अधिकारियों के समक्ष ज़मीन के लिए घर के पट्टे देने के लिए अभ्यावेदन दायर किया, जिसके बारे में कहा गया कि वह ज़मीन उनके कब्ज़े में है.
उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने आंध्र प्रदेश के तत्कालीन उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसमें कहा गया कि राजस्व अधिकारी उनके अभ्यावेदन पर विचार किए बिना उनके कब्ज़े वाले भूखंडों से उन्हें बेदखल करना चाहते हैं.
दिनांक 13.09.2013 के आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए, तहसीलदार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं की पात्रता के अधीन आवास स्थल के अनुदान के लिए उनके आवेदन पर विचार करें और दो महीने की अवधि के भीतर लिए गए निर्णय से अवगत कराएँ. यह भी निर्देश दिया गया कि यदि याचिकाकर्ताओं के पास भूमि का कब्जा है, तो तहसीलदार सहित कोई भी प्रतिवादी उनके कब्जे में खलल नहीं डालेगा.
लोगों के एक अन्य समूह ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि वे दो साल से गुंटूर जिले में जमीनों पर काबिज हैं और घर के लिए जगह देने के उनके अनुरोध पर विचार किए बिना उन्हें हटाने की मांग की जा रही है. उनके मामले में, 11.12.2013 के आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि तहसीलदार संरचनाओं को जबरन हटाने में शामिल होकर कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते.
इसके बाद दोनों मामलों में याचिकाकर्ताओं ने अवमानना याचिकाएं दायर कर दलील दी कि उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद तहसीलदार ने 06.12.2013 और 08.01.2014 को जबरन उनकी झोपड़ियां हटा दीं.
हाईकोर्ट ने पाया कि तहसीलदार के अनुरोध पर 08.01.2014 को 88 पुलिसकर्मियों को घटनास्थल पर लाया गया था और तहसीलदार ने जानबूझकर अदालत के आदेशों की घोर अवज्ञा की. ऐसे में उसे 2 महीने के साधारण कारावास के साथ-साथ 2000/- रुपये का जुर्माना भरने की सजा सुनाई.
इसे लेकर तहसीलदार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस बीच तहसीलदार का प्रमोशन होता गया और वह डिप्टी कलेक्टर बन गया.
शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने आदेश दिया कि आंध्र प्रदेश सरकार याचिकाकर्ता डिप्टी कलेक्टर को तहसीलदार के पद पर पदावनत करे. साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता 4 सप्ताह के भीतर 1 लाख रुपए का जुर्माना जमा कराए.
अदालत ने अपने फैसले में कहा-यद्यपि याचिकाकर्ता किसी भी नरम रुख का हकदार नहीं है, लेकिन हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता के अड़ियल और कठोर रवैये के कारण उसके बच्चों और परिवार को परेशान नहीं किया जाना चाहिए. यदि उसे 2 महीने की सजा होती है, तो उसे अपनी सेवाओं से बर्खास्त कर दिया जाएगा, जिससे उसके परिवार की आजीविका छिन जाएगी. इसलिए, हम याचिकाकर्ता की सजा की पुष्टि करने के लिए इच्छुक हैं, लेकिन सजा पर नरम रुख अपनाते हैं. इस मामले में एक संदेश दिए जाने की आवश्यकता है.
अदालत ने कहा-याचिकाकर्ता को उसकी सेवा के पदानुक्रम में एक स्तर कम करने का निर्देश दिया जाता है. आंध्र प्रदेश राज्य को याचिकाकर्ता को तहसीलदार के पद पर पदावनत करने का निर्देश दिया जाता है. आगे पदोन्नति के अवसरों पर विचार किया जाएगा....उसे 1 लाख रुपये का जुर्माना भी देना होगा.
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील के तर्कों को सुनने के बाद कहा-वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता और उनका पूरा परिवार सड़कों पर आ जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि याचिकाकर्ता के 2 बच्चे जो 11वीं और 12वीं कक्षा में शिक्षा ले रहे हैं, वे अपनी शिक्षा जारी रखने की स्थिति में नहीं होंगे और उनका करियर बर्बाद हो जाएगा. हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता को यह सब तब सोचना चाहिए था जब उसने झुग्गीवासियों के ढाँचे को गिरा दिया और उन्हें उनके सामान के साथ सड़क पर फेंक दिया. यदि याचिकाकर्ता मानवीय दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है, तो उसे अमानवीय तरीके से काम नहीं करना चाहिए था.