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POCSO केस में SC का अहम फैसला: बच्ची की खामोशी को माना सबूत

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14 नव. 2025, 05:43 AM 2 मिनट में पढ़ें 2

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नई दिल्ली । डेस्क: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2025 को दिनेश कुमार जल्दहारी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने चार साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न के दोषी एक व्यक्ति की सज़ा को सात साल से घटाकर छह साल कर दिया, लेकिन उसकी कनविक्शन को बरकरार रखा.


इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के ट्रॉमा के प्रति गहरी संवेदनशीलता दिखाई. कोर्ट ने टिप्पणी की कि "घटना के सदमे ने... पीड़ित के सदमे से भरे व्यवहार में अपना बयान दिया." न्यायालय ने जोर देकर कहा कि अगर कोई छोटी बच्ची अदालत में गवाही नहीं दे पाती है, तो इसे अभियोजन पक्ष की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके दर्द और डर का प्रमाण माना जाना चाहिए.

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यह मामला जशपुर, छत्तीसगढ़ का है, जहाँ 15 अगस्त 2021 को पीड़ित बच्ची की माँ ने आरोपी दिनेश कुमार जल्दहारी को अपनी 4 साल की बेटी के पास आपत्तिजनक स्थिति में पाया था. बच्ची दर्द से परेशान थी.


ट्रायल के दौरान जब बच्ची को अदालत में लाया गया और आरोपी को दिखाया गया, तो वह अनियंत्रित रूप से रोने लगी और कुछ भी बोलने में असमर्थ रही. सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवहार को ही "एक संकेत" माना, जो बच्चे पर हुए आघात को दर्शाता है.


अदालत ने आरोपी की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि यौन उत्पीड़न के लिए शारीरिक प्रवेश (penetration) ज़रूरी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम की धारा 9(m) के तहत, 12 साल से कम उम्र के बच्चे पर किसी भी तरह का यौन हमला गंभीर यौन हमला (Aggravated Sexual Assault) माना जाता है.


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के सुसंगत और विश्वसनीय बयान, साथ ही बच्ची के व्यवहार को देखते हुए, निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला "पूरी तरह से कानूनी और उचित" था.


हालाँकि, कोर्ट ने यह देखते हुए कि दोषी पहले ही 4 साल 5 महीने जेल में बिता चुका है, उसकी कठोर कारावास की सज़ा को 7 साल से घटाकर 6 साल कर दिया. इस ऐतिहासिक फैसले ने यह स्थापित किया है कि अदालतों को विशेष रूप से छोटे बच्चों से जुड़े मामलों में पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP