18 साल बाद छत्तीसगढ़ के सलवा जुड़ूम की याचिका का हुआ निपटारा
रायपुर | संवाददाता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संसद या विधानसभा द्वारा बनाया गया कोई भी क़ानून न्यायालय की अवमानना नहीं माना जा सकता है. अदालत ने कहा कि किसी अधिनियम का सरल शब्दों में प्रवर्तन केवल विधायी कार्य की अभिव्यक्ति है और इसे न्यायालय की अवमानना नहीं कहा जा सकता, जब तक कि यह पहले स्थापित न हो जाए कि इस प्रकार से अधिनियमित किया गया कानून संवैधानिक रूप से या अन्यथा विधि की दृष्टि से गलत है. इस आदेश के साथ ही पिछले 18 सालों से सुप्रीम कोर्ट में सलवा जुड़ूम को लेकर लंबित याचिका का निपटारा कर दिया है.
गौरतलब है कि 2007 में समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करते हुए छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार के संरक्षण में चलाए जा रहे सलवा जुड़ूम पर रोक लगाने की मांग की थी. सलवा जुड़ूम में तत्कालीन रमन सिंह सरकार में आम आदिवासियों को नक्सलियों से लड़ने के लिए हथियार दे दिए गए थे.
बाद में जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो राज्य सरकार ने इन हथियारबंद लोगों को एसपीओ और कोया कमांडो के तौर पर बहाल करने की बात कही. इसके बाद 5 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुड़ूम को ग़ैरक़ानूनी बताते हुए राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की और इस पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सुनाया. इसके बाद राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ सहायक सशस्त्र पुलिस बल अधिनियम, 2011 (“अधिनियम”) लागू कर इन सशस्त्र लोगों को नौकरी दे दी. इसे नंदिनी सुंदर ने अदालत की अवमानना बताते हुए एक और याचिका दायर की थी.
जुलाई 2011 में सुनाए गए आदेश, जिसमें एसपीओ की नियुक्ति रोकने, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट, सीबीआई जांच आदि मुद्दों पर निर्देश दिए गए थे. नंदिनी सुंदर की ओर से मांग की गई थी कि याचिकाओं में दाखिल सभी आवेदनों और अवमानना याचिका को सुनकर आवश्यक आदेश दिए जाएं. उनकी ओर से मांग की गई कि याचिकाएं लंबित रखी जाएं और उपयुक्त आदेश पारित किए जाएं.
लेकिन केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ राज्य की ओर से उपस्थित एएसजी के.एम. नटराज ने तर्क दिया कि 05.07.2011 के आदेश की अनुच्छेद 96 में निर्धारित सभी रिपोर्टें दाखिल की जा चुकी हैं. इसलिए अब याचिकाओं को लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है.
अदालत ने कहा कि याचिका में न्यायालय के आदेश की अवमानना पर कार्रवाई, एफआईआर नहीं होने तक SPO कर्मियों की सरकारी सेवा में नियुक्ति रोकने और याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत पुनर्वास योजना लागू करने की मांग की गई है. हमने पाया कि इन प्रार्थनाओं पर न्यायालय ने पहले ही आदेश पारित कर दिए हैं.
अदालत ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि पुनर्वास योजना दाखिल की गई है और नई विधायी कार्रवाई न्यायालय के आदेश के प्रतिकूल है. NHRC द्वारा भी न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किया गया है. इस स्थिति में हम पाते हैं कि राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर काम करना होगा ताकि शांति और पुनर्वास संभव हो सके.
अदालत ने कहा कि हालांकि, किसी विधेयक का पारित होना स्वतः न्यायालय की अवमानना नहीं होता जब तक कि वह असंवैधानिक घोषित न किया जाए. अगर किसी को ऐसा लगता है तो वह विधिक प्रक्रिया के तहत वैधता को चुनौती दे सकता है.
अवमानना याचिका में जो प्रार्थनाएं की गई हैं, वे वास्तव में रिट याचिकाओं में की जानी चाहिए थीं. अतः हम इस अवमानना याचिका पर आगे विचार नहीं कर सकते और इसे समाप्त करते हैं. रिट याचिकाओं में की गई प्रार्थनाओं पर पहले ही निर्णय हो चुका है, अतः अब वे विचारणीय नहीं हैं. इसी तरह अनुच्छेद 96 के अंतर्गत मांगी गई रिपोर्टें भी प्रस्तुत की जा चुकी हैं.
याचिकाओं का निपटारा करते हुए अदालत ने कहा कि NHRC द्वारा अनुपालना न करने की शिकायत अब विचारणीय नहीं है क्योंकि हम अब याचिकाओं का निपटारा कर रहे हैं. उपर्युक्त विवेचन के आलोक में, रिट याचिकाएं और अवमानना याचिका समाप्त की जाती हैं. लंबित आवेदन भी समाप्त माने जाएं.