अस्वस्थ माता-पिता की सेवा से रोकना क्रूरता, हाई कोर्ट ने मंजूर किया तलाक
बिलासपुर । संवाददाता: विवाह के पश्चात दंपति का अपना नया संसार जरूर बसता है, किंतु यह स्थिति किसी संतान को उसके वृद्ध एवं अस्वस्थ माता-पिता की देखरेख के दायित्वों से मुक्त नहीं करती. यदि पत्नी बिना किसी वाजिब कारण के पति पर उसके अस्वस्थ सास-ससुर को त्यागकर पृथक रहने का अनवरत दबाव बनाती है, तो यह कृत्य पति के विरुद्ध मानसिक प्रताड़ना के दायरे में आता है.
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम याचिका को खारिज करते हुए इस महत्वपूर्ण वैधानिक व नैतिक सिद्धांत को रेखांकित किया है. जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने मामले की समीक्षा के उपरांत डोंगरगढ़ स्थित फैमिली कोर्ट द्वारा मंजूर किए गए तलाक के आदेश को पूरी तरह जायज ठहराया है.
इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2007 में राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ निवासी सिख युवक और पत्थलगांव की महिला के विवाह के उपरांत हुई थी. दांपत्य जीवन के करीब डेढ़ वर्ष बीतने के बाद पारिवारिक क्लेश गहराने लगा.
पति का पक्ष था कि उसके पिता तीन बार हृदय शल्य चिकित्सा (हार्ट सर्जरी) से गुजर चुके थे, इसके बावजूद पत्नी लगातार उस पर माता-पिता से अलग होकर रहने का दबाव बनाती रही. इनकार करने पर बुजुर्गों के प्रति अनुचित व्यवहार और कलह का दौर जारी रहा.
हालांकि 2018 में सामाजिक मध्यस्थता के दौरान पत्नी ने लिखित माफीनामा भी दिया था, फिर भी रिश्तों में सुधार नहीं आ सका, जिसके बाद पति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया.
निचली अदालत ने 11 नवंबर 2024 को मानसिक क्रूरता को आधार मानते हुए तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली थी, जिसे पत्नी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी. अपील याचिका में महिला ने ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न करने और व्यवसाय शुरू करने के लिए 50 लाख रुपये मायके से लाने का दबाव बनाने का आरोप लगाया.
हालांकि, हाई कोर्ट ने सभी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और केस फाइल का गहन अवलोकन करने के बाद इन आरोपों को तथ्यहीन पाया. अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्वस्थ माता-पिता का संबल बनना बेटे का विधिक और नैतिक कर्तव्य है, और इसमें बाधा डालना मानसिक प्रताड़ना ही कहलाएगा.