फुले फिल्म को बस्तर में मिल रहा अच्छा रिस्पांस
छत्तीसगढ़ के बस्तर में फुले फिल्म को मिल रहा दर्शकों का प्यार
जगदलपुर | संवाददाताः छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर में सर्व समाज की विशेष मांग पर गुरुवार को शहर के सिनेमाघर में 2 दिनों के लिए 'फुले' फ़िल्म दिखाई जा रही है.
सिनेमाघर में फ़िल्म लगने पर बस्तर के लोगों ने खुशी जाहिर की है. बड़ी संख्या में बस्तर संभाग के सभी जिलों से दर्शक फ़िल्म देखने सिनेमाघर पहुंच रहे हैं.
फुले फिल्म को लेकर ब्राह्मण सभा ने देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध किया था. जिसके चलते कुछ दृश्य कट करने के बाद फिल्म प्रदर्शित की गई.
हालांकि इसके बाद भी यह फ़िल्म सभी सिनेमाघरों में नहीं लग रही है.
बस्तर में 2 दिनों के लिए लगाई गई फ़िल्म
आदिवासी समाज की सदस्य रुक्मणि कर्मा का कहना है कि यह फ़िल्म ज्योतिबा फुले व सावित्री फुले पर आधारित है.
फ़िल्म में किसी समाज की आलोचना या नुकसान को नहीं दर्शाया गया है. दोनों ही पति-पत्नी महिलाओं के लिए कठिन परिस्थितियों में कैसे लड़े यह दर्शाया गया है. महिलाओं की शिक्षा के लिए लड़ा गया है.
पिछड़े तबके व दलित वर्ग को शिक्षा का अधिकार देकर पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले बनी थीं. जो आज सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं.
इस फ़िल्म को लेकर देश में कई जगहों में विरोध हुआ है. सर्व आदिवासी समाज इसकी कड़ी निंदा करता है.
आदिवासी समाज ने फ़िल्म देखने की अपीलआदिवासी समाज के सदस्य भैरम नाग ने बताया कि यह फ़िल्म केवल मनोरंजन के लिए नहीं है. इस फ़िल्म को देखकर सीखने और समझने की आवश्यकता है.
जानना है कि महापुरुषों ने नीचे तबके के लोगों के लिए कितना संघर्ष किया है. महिलाओं को पढ़ने का अधिकार सावित्री बाई फुले ने दिया है.
आज महिलाएं देशभर में चपरासी से लेकर कलेक्टर और वार्ड पंच से लेकर राष्ट्रपति तक बन रही हैं. आदिवासी समाज की तरफ से अपील करते हैं कि पहली महिला शिक्षिका बनकर महिलाओं को आगे करने वाली सावित्री बाई फुले के जीवन पर बनी फिल्म सभी को देखना चाहिये.
बस्तर में फ़िल्म की हो रही सराहना
अनुसूचित जाति के जिला अध्यक्ष विक्रम लहरे ने बताया कि समाज में लोगों को लगता है कि फ़िल्म के माध्यम से उन्हें ट्रोल किया जा रहा है. जिसके कारण देश भर में विरोध हो रहा है, जो उचित नहीं है.
उन सभी को सिनेमाघरों में जाकर देखना चाहिए कि यह फिल्म कैसी है और उनका संघर्ष कैसा रहा. उस जमाने में जो लोगों में बीता था, वही आज फ़िल्म में दिखाया गया है.
आज के युग और फुले परिवार के युग में जमीन आसमान का फर्क है. यह फ़िल्म महात्मा ज्योतिबा राव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित है.
इस फ़िल्म में उनके साहस, संघर्ष और समाज में बदलाव लाने के विचारों को दर्शाया गया है. उन्होंने शोषित, वंचित, पिछड़ें समाज और महिलाओं के सामाजिक अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया.
एक अन्य दर्शक का कहना है कि फुले दंपति भारतीय समाज में फैले जातिगत उत्पीड़न, भेदभाव और अंधविश्वास के विरोधी रहे. उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर सन 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला. जिसमें उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले इस स्कूल की पहली महिला शिक्षिका बनीं. उन्होंने अपने समाज के लोगों को उनके अधिकार दिलाने की कोशिश की. उन्होंने बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा उत्पीड़न का कड़ा विरोध किया.