ओडिशा: महिला किसानों के लिए 'महिला-अनुकूल' कृषि यंत्र
भुवनेश्वर । डेस्क: ओडिशा सरकार ने कृषि क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम उठाया है. अब राज्य की सभी सरकारी योजनाओं के तहत वितरित होने वाले कृषि उपकरण महिलाओं की शारीरिक बनावट और क्षमता को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएंगे. यह निर्णय विशेष रूप से बुआई से कटाई तक की उन कृषि क्रियाओं पर केंद्रित है, जहां महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं.
विशेषज्ञों के जमीनी सर्वेक्षण के बाद जारी मानक संचालित प्रक्रिया (एसओपी) इस बदलाव का आधार बनेगी, जो महिलाओं के स्वास्थ्य और उत्पादकता को बढ़ावा देगी.
कृषि कार्यों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए यह नीति समयबद्ध साबित हो सकती है. भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक, कृषि क्षेत्र में महिलाओं का योगदान 2017-18 के 57 प्रतिशत से उछलकर 2023-24 में 64.4 प्रतिशत हो गया है. वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों से पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर करीब 900 मिलियन महिलाएं कृषि से जुड़ी हुई हैं.
ओडिशा में यह आंकड़ा और भी प्रासंगिक है, जहां महिलाएं खेतों में कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं, लेकिन पारंपरिक उपकरणों की वजह से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के एक अध्ययन से खुलासा हुआ है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा महिला किसानों को पूरे शरीर में गंभीर मस्कुलोस्केलेटल विकारों की समस्या हो रही है. इनमें 56 प्रतिशत महिलाओं को पीठ दर्द, 59 प्रतिशत को कंधे की तकलीफ, 69 प्रतिशत को पैरों में दर्द, 51 प्रतिशत को सिरदर्द, 50 प्रतिशत को गर्मी से तनाव और 53 प्रतिशत को डिहाइड्रेशन जैसी परेशानियां शामिल हैं.
पुरुषों के लिए डिजाइन किए गए भारी उपकरणों का उपयोग करने से ये समस्याएं और गंभीर हो जाती हैं. सरकार का मानना है कि महिला-केंद्रित डिजाइन न केवल इन जोखिमों को कम करेंगे, बल्कि खेती की दक्षता भी बढ़ाएंगे.
इस नीति को तैयार करने के लिए ओडिशा सरकार ने श्री अन्न योजना (पहले ओडिशा मिलेट्स के नाम से जानी जाती) के तहत सुंदरगढ़, क्योंझर, कोरापुट, नुआपड़ा और गजापती जैसे पांच जिलों में गहन अध्ययन किया. यहां बाजरा जैसी फसलों में इस्तेमाल होने वाले निराई यंत्र, स्प्रेयर और थ्रेशर जैसे उपकरणों के प्रोटोटाइप विकसित कर परीक्षण किया गया.
ओडिशा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, परीक्षण केंद्रों और सामाजिक वैज्ञानिकों के सहयोग से 'अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना ऑन एर्गोनॉमिक्स एंड सेफ्टी' के अनुभवों को शामिल किया गया. स्थानीय निर्माताओं के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर उत्पादन और वितरण की योजना भी जोर पकड़ रही है.
आगे की राह में सरकार मौजूदा और नए डिजाइनों का महिला किसानों पर व्यापक परीक्षण सुनिश्चित करेगी. कृषि एवं किसान सशक्तिकरण विभाग में नोडल एजेंसी गठित की जा रही है, जो आगे के मूल्यांकनों का केंद्र बनेगी.
यदि डिजाइन प्रक्रिया में महिलाओं को सक्रिय रूप से शामिल किया गया, तो इससे न केवल बेहतर मशीनें उभरेंगी, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि और स्वास्थ्य सुधार भी होगा. यह कदम आधुनिक तकनीक को पारंपरिक खेती से जोड़ते हुए एक समावेशी कृषि क्रांति की नींव रख सकता है.