बस्तर में नक्सली प्रभाव खत्म, लेकिन बारूदी सुरंगों का छिपा जाल बड़ी चुनौती
नई दिल्ली । डेस्क: सरकार द्वारा देश को नक्सली प्रभाव से मुक्त घोषित किए जाने के बावजूद, सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अभी भी घने जंगलों और पहाड़ियों में दबे विस्फोटकों के छिपे संजाल के कारण गंभीर खतरे का सामना कर रहा है. हाल ही में कांकेर और नारायणपुर जिलों में चलाए गए डि-माइनिंग (बारूदी सुरंग हटाने) अभियान के दौरान एक आईईडी (IED) विस्फोट में चार सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए, जिससे इस खतरे की गंभीरता का पता चलता है.
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, माओवादी समूहों ने बीते वर्षों में बस्तर के बड़े हिस्से को बारूदी सुरंगों में तब्दील कर दिया है. खुफिया अनुमानों के मुताबिक, इस क्षेत्र में अब भी लगभग 1,300 से 1,400 आईईडी बिखरे हो सकते हैं. कुछ पहाड़ी रास्तों पर तो हर 20 से 25 मीटर की दूरी पर विस्फोटक दबे हैं, जो सैनिकों की आवाजाही को रोकने के लिए बिछाए गए थे.
सुरक्षा बलों ने अब तक 35 अत्याधुनिक हथियार, लगभग 450 आईईडी और 899 बंडल कोरडेक्स वायर बरामद किए हैं. इस अभियान के दौरान सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के 52 भूमिगत डंप, 152 बंकर और 12 अस्थायी ठिकानों को नष्ट कर दिया है. इन गुप्त ठिकानों से हथियारों के साथ-साथ भारी मात्रा में राशन, मशीनरी और संचार उपकरण भी मिले हैं, जो इनके मजबूत रसद तंत्र को दर्शाते हैं.
अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के कारण पीछे हटते हुए माओवादियों ने सुनियोजित तरीके से ये आईईडी लगाए थे, ताकि एंटी-नक्सल ऑपरेशन की गति को धीमा किया जा सके.
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि भले ही माओवादियों का क्षेत्रीय नियंत्रण खत्म हो गया हो, लेकिन मेटल डिटेक्टरों को चकमा देने वाले इन छिपे हुए विस्फोटकों को खोजना और उन्हें निष्क्रिय करना इस अभियान का सबसे जटिल और खतरनाक चरण बना हुआ है.