मंगल, 20 अक्टू. 2026

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समर्पण करने वाले नक्सलियों में क्यों मची है खलबली?

छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा के बयान ने आत्मसमर्पण कर चुके बड़े नक्सली नेताओं के भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

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20 अक्टू. 2026, 10:09 AM 10 मिनट में पढ़ें 18

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रायपुर | विशेष संवाददाता: छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा के बयान ने आत्मसमर्पण कर चुके बड़े नक्सली नेताओं के भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. पिछले कुछ वर्षों में हथियार छोड़कर सरकार की पुनर्वास नीति के तहत मुख्यधारा में लौटे कई वरिष्ठ कैडरों को नई जिंदगी शुरू करने का मौका मिला है. 

लेकिन गृहमंत्री ने जेलों में बंद नक्सलियों को लेकर कहा है कि हत्या, गंभीर हिंसा और यूएपीए जैसे मामलों में किसी तरह की राहत नहीं दी जाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलियों की छोटी-मोटी मदद करने वालों की रिहाई पर सरकार काम कर रही है.तो क्या इसका मतलब यह है कि आत्मसमर्पण करने वाले बड़े नेताओं के खिलाफ पुराने मुकदमे चलते रहेंगे? क्या देवजी, भूपति, भास्कर, सतीश, पापा राव और दूसरे वरिष्ठ कैडरों को भी अदालतों में अपने खिलाफ दर्ज मामलों का सामना करना होगा?

छत्तीसगढ़ में नक्सल मामलों की वापसी की प्रक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हथियार छोड़ने के बाद क्या किसी व्यक्ति का अतीत भी पीछे छूट जाता है?राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा ने हालिया समीक्षा बैठक में अधिकारियों को पात्र मामलों की छंटनी और प्रक्रिया पूरी करने के लिए समयसीमा तय की है. सरकार का कहना है कि जिन मामलों में जानमाल का नुकसान, गंभीर हिंसक अपराध या गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए के तहत आरोप हैं, उन्हें प्रस्तावित केस वापसी प्रक्रिया से बाहर रखा जाएगा. 

दूसरी ओर, कम गंभीर और प्रक्रियात्मक अपराधों में बंद लोगों के मामलों की समीक्षा की जाएगी. यह फैसला बस्तर के उन ग्रामीणों के लिए राहत की उम्मीद पैदा करता है, जो वर्षों से जेलों में बंद हैं. इनमें कुछ पर नक्सलियों तक राशन पहुंचाने, उनके कहने पर पर्चे-बैनर लगाने या दबाव में उनकी मदद करने के आरोप हैं. लेकिन इसी फैसले के बीच एक दूसरा सवाल भी उठ रहा है. अगर कम गंभीर आरोपों में बंद ग्रामीणों के मुकदमों की वापसी पर विचार हो सकता है, तो हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटे वरिष्ठ माओवादी नेताओं के खिलाफ दर्ज पुराने मुकदमों का क्या होगा? क्या देवजी, भूपति, भास्कर, सतीश और पापा राव जैसे वरिष्ठ कैडरों को भी अपने खिलाफ दर्ज मामलों में कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा? और क्या आत्मसमर्पण करने वाले किसी व्यक्ति को पुनर्वास का लाभ मिलने का अर्थ यह भी है कि उसके पुराने अपराधों पर कार्रवाई नहीं होगी? 

इस सवाल का जवाब सरकार की पुनर्वास नीति और भारतीय आपराधिक कानून के बीच का अंतर समझने में छिपा है. पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 से मार्च 2026 के बीच देशभर में 3,927 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया. अक्टूबर 2025 में माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेता मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू, जिन्हें भूपति के नाम से भी जाना जाता है, ने महाराष्ट्र में आत्मसमर्पण किया था. इसी तरह देवजी के तेलंगाना में आत्मसमर्पण किया.

इन घटनाओं ने माओवादी संगठन की भावी रणनीति, नेतृत्व और पुनर्वास नीति को लेकर कई सवाल खड़े किए. लेकिन किसी वरिष्ठ कैडर के आत्मसमर्पण की खबर से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके खिलाफ दर्ज मुकदमे खत्म हो गए हैं या वह कानूनी कार्रवाई से मुक्त हो गया है. आत्मसमर्पण और कानूनी माफी दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. किसी व्यक्ति का हथियार छोड़ना, संगठन से नाता तोड़ना और हिंसा का रास्ता छोड़ने का वादा करना उसके पुनर्वास का आधार बन सकता है.

सरकार की नीति के तहत उसे आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और दूसरी सुविधाएं मिल सकती हैं. छत्तीसगढ़ की मार्च 2025 में घोषित आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का उद्देश्य भी हिंसा छोड़ने वालों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है. लेकिन पुनर्वास का अर्थ पुराने आपराधिक मामलों का स्वतः समाप्त हो जाना नहीं है. किसी व्यक्ति के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, विस्फोट या अन्य गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं, तो उनका निपटारा लागू कानून और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ही होगा. यहां तीन स्थितियों के बीच अंतर समझना जरूरी है. आत्मसमर्पण पुनर्वास की प्रक्रिया है. जमानत न्यायिक हिरासत से संबंधित राहत है. 

अभियोजन वापसी किसी लंबित आपराधिक मुकदमे को समाप्त करने की अलग कानूनी प्रक्रिया है. इनमें से किसी एक का लाभ मिलने से बाकी दोनों के परिणाम अपने आप तय नहीं हो जाते. इसलिए किसी वरिष्ठ माओवादी नेता की वर्तमान स्थिति का आकलन करने के लिए उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारी, जमानत, हिरासत और संबंधित अदालतों के आदेशों की अलग-अलग पुष्टि जरूरी है. अब सवाल उठता है कि क्या हत्या और यूएपीए के मामले वापस नहीं हो सकते? यहां कानूनी स्थिति को समझना जरूरी है. 

कानून के जानकार बताते हैं कि भारतीय कानून में अभियोजन वापस लेने का प्रावधान मौजूद है. पुराने मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 360 प्रासंगिक हैं. किस मामले में कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह उसकी परिस्थितियों और लागू कानूनी व्यवस्था पर निर्भर करता है. इन प्रावधानों के तहत लोक अभियोजक अदालत की सहमति से अभियोजन वापस लेने की मांग कर सकता है. राज्य सरकार मामले की समीक्षा करने और वापसी पर विचार करने के निर्देश दे सकती है, लेकिन उसका निर्देश अपने आप मुकदमा समाप्त नहीं करता.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोक अभियोजक को मामले के तथ्यों और साक्ष्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा. उसे यह संतुष्ट होना चाहिए कि अभियोजन वापस लेने से व्यापक जनहित और न्याय के उद्देश्य पूरे होंगे. अदालत भी यह देखती है कि आवेदन सद्भावना से किया गया है या उसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करना है. इसका अर्थ यह है कि अदालत केवल सरकार की इच्छा के आधार पर किसी मुकदमे को समाप्त करने की औपचारिक मुहर नहीं लगाती. उसे आवेदन के पीछे के कारणों और संबंधित कानूनी पहलुओं पर विचार करना होता है. गंभीर अपराधों के मामलों में यह जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. हालांकि, केवल अपराध की श्रेणी के आधार पर हर मामले के परिणाम का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता. अभियोजन वापसी के आवेदन पर निर्णय संबंधित तथ्यों, लागू कानून और न्यायिक परीक्षण के आधार पर होगा.

यूएपीए जैसे केंद्रीय कानूनों के मामलों में अतिरिक्त कानूनी प्रतिबंध और सक्षम प्राधिकार की अनुमति से जुड़े प्रश्न भी प्रासंगिक हो सकते हैं. इसलिए ऐसे मामलों में यह कहना सही नहीं होगा कि राज्य सरकार का एक आदेश ही मुकदमा समाप्त करने के लिए पर्याप्त है. एक और अंतर समझना जरूरी है. गंभीर अपराधों को छत्तीसगढ़ सरकार की मौजूदा प्रस्तावित केस वापसी प्रक्रिया से बाहर रखना सरकार की घोषित नीति है. यह कहना अलग बात होगी कि भारतीय कानून में किसी भी परिस्थिति में ऐसे मामलों में अभियोजन वापसी की कोई संभावना ही नहीं है. दोनों दावों को एक नहीं समझना चाहिए. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर ग्रामीणों को राहत कैसे मिलेगी?

बस्तर में इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उन ग्रामीणों की स्थिति है, जो नक्सल प्रभावित इलाकों में रहते हुए हिंसा और दबाव के बीच फंस गए. सरकार के सामने ऐसे मामलों की समीक्षा का सवाल है, जिनमें आरोपियों पर राशन पहुंचाने, पर्चे-बैनर लगाने या नक्सलियों की अन्य गतिविधियों में सहयोग करने के आरोप हैं. लेकिन इन आरोपों की प्रकृति, आरोपी की वास्तविक भूमिका और उपलब्ध साक्ष्य हर मामले में अलग हो सकते हैं.

मसलन, एक ग्रामीण पर आरोप है कि उसने हथियारबंद लोगों की धमकी के कारण उन्हें राशन पहुंचाया. दूसरे व्यक्ति पर हथियार लूटने, विस्फोट करने या किसी की हत्या की साजिश में सक्रिय भागीदारी का आरोप है. दोनों मामलों को एक ही श्रेणी में रखकर फैसला करना उचित नहीं होगा.

लेकिन यह भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति को केवल ग्रामीण होने या दबाव में काम करने का दावा करने के आधार पर स्वतः निर्दोष न मान लिया जाए. दबाव, धमकी, स्वेच्छा से सहयोग और हिंसक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के बीच अंतर का आकलन साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए. कानून के जानकार बताते हैं कि केस डायरी, चार्जशीट, गवाहों के बयान, आरोपों की धाराएं और आरोपी की भूमिका की समीक्षा महत्वपूर्ण है. जहां आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं या आरोपी की भूमिका सीमित है, वहां कानून के अनुसार उचित राहत पर विचार किया जा सकता है. वहीं, गंभीर अपराधों के ठोस साक्ष्य मौजूद होने पर केवल पुनर्वास नीति का हवाला देकर मुकदमा समाप्त करना न्याय के उद्देश्य से टकरा सकता है. 

जेल में बंद किसी व्यक्ति की लंबी हिरासत भी एक महत्वपूर्ण सवाल है. लेकिन यह तय करने के लिए कि उसे रिहा किया जाना चाहिए या उसके खिलाफ मुकदमा वापस लिया जाना चाहिए, मामले की वास्तविक स्थिति और लागू कानूनी प्रक्रिया को देखना होगा. बड़े कैडर और ग्रामीणों के लिए अलग-अलग पैमाने तो नहीं? यदि किसी वरिष्ठ माओवादी कैडर ने आत्मसमर्पण किया है, तो उसके पुनर्वास और समाज में वापसी के रास्ते पर विचार किया जा सकता है. 

लेकिन यदि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, तो उन मामलों का निपटारा भी कानून के अनुसार होना चाहिए. इसी तरह, यदि किसी ग्रामीण पर कमजोर साक्ष्यों के आधार पर मुकदमा चल रहा है या उसकी भूमिका केवल दबाव में सीमित सहयोग तक रही है, तो उसके मामले की निष्पक्ष समीक्षा भी जरूरी है. इन दोनों स्थितियों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय एक ही कसौटी पर परखना चाहिए: कानून, साक्ष्य और व्यक्ति की वास्तविक भूमिका.

बस्तर में नक्सलवाद का असर केवल हथियार उठाने वालों तक सीमित नहीं रहा है. संघर्ष के बीच रहने वाले ग्रामीणों पर पुलिस और नक्सलियों, दोनों तरफ से दबाव पड़ने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी दोहरी है- हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करना और उन लोगों को न्याय दिलाना, जो दबाव, धमकी या कमजोर साक्ष्यों के कारण आपराधिक मामलों में फंसे हो सकते हैं. 

लेकिन इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने मुकदमे वापस लिए गए या कितने लोगों को जेल से रिहाई मिली. यह भी देखना होगा कि पात्रता के मानदंड क्या हैं, एक जैसे मामलों में एक जैसे नियम लागू होते हैं या नहीं, पीड़ित परिवारों की बात सुनी जाती है या नहीं और अदालतों के सामने पर्याप्त तथ्य रखे जाते हैं या नहीं.

आत्मसमर्पण करने वालों को पुनर्वास का अवसर देना हिंसा से बाहर निकलने और शांति की दिशा में बढ़ने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है. वहीं, लंबे समय से जेलों में बंद ग्रामीणों के मामलों की निष्पक्ष समीक्षा न्याय तक उनकी पहुंच के लिए महत्वपूर्ण है. लेकिन पुनर्वास और जवाबदेही में से किसी एक को चुनना जरूरी नहीं है. दोनों साथ चल सकते हैं, बशर्ते फैसले स्पष्ट मानदंडों और कानून के आधार पर लिए जाएं. अगर किसी वरिष्ठ कैडर पर गंभीर अपराध के आरोप हैं, तो उसके मामले में भी कानूनी प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए. अगर किसी ग्रामीण के खिलाफ साक्ष्य कमजोर हैं या उसकी भूमिका सीमित रही है, तो उसे भी निष्पक्ष सुनवाई और कानून के तहत उपलब्ध राहत मिलनी चाहिए.

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि आत्मसमर्पण करने वाले बड़े नक्सली नेताओं को पुराने मुकदमों में राहत मिलेगी या नहीं. असली सवाल यह है कि सरकार की केस वापसी प्रक्रिया किसे, किन आधारों पर और किस तरह की जांच के बाद राहत देगी. क्योंकि हथियार छोड़ना शांति की शुरुआत हो सकता है, लेकिन न्याय का अंतिम फैसला न तो आत्मसमर्पण से होता है और न ही सरकार की घोषणा से, उसके लिए कानून और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया जरूरी है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP