आरंभिक हिंदी को छत्तीसगढ़ का अवदान
पीयूष कुमार
हिंदी साहित्य के इतिहास में जब आधुनिक हिंदी के निर्माण और विकास की चर्चा होती है, तब प्रायः काशी, प्रयाग, कलकत्ता, दिल्ली, लखनऊ आदि केंद्रों का उल्लेख प्रमुखता से मिलता है. किंतु हिंदी के आरंभिक आधुनिक स्वरूप के निर्माण में मध्य भारत और विशेषतः वर्तमान छत्तीसगढ़ अंचल की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रही है.
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों तक वर्तमान राज्य छत्तीसगढ़ एक राजनीतिक इकाई के रूप में भले गठित नहीं हुआ था पर समग्र छत्तीसगढ़ अंचल में ऐसे अनेक रचनाकार सक्रिय रहे, जिन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, पत्रकारिता, छंदशास्त्र, व्याकरण, संपादन और साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में हिंदी को समृद्ध किया और छत्तीसगढ़ की उपस्थिति को राष्ट्रीय स्तर पर हमेशा के लिए प्रतिष्ठित किया.
ठाकुर जगमोहन सिंह : आरंभिक कल्पना-प्रधान गद्य के शिल्पकार

छत्तीसगढ़ की आरंभिक हिंदी साहित्यिक परंपरा में ठाकुर जगमोहन सिंह (1857–1899) भारतेन्दु युग के कवि, गद्यकार और उपन्यासकार थे. वे मध्य भारत की एक रियासत विजयराघवगढ़ से संबंधित थे और काशी में शिक्षा के दौरान भारतेन्दु हरिश्चंद्र के साहित्यिक वातावरण से प्रभावित होकर ‘भारतेन्दु मंडल’ के सदस्य बने. ब्रिटिश राज में अधिकारी थे और शिवरीनारायण में तहसीलदार रहते हुए उन्होंने 1885 में अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘श्यामास्वप्न’ पूरा किया था.
‘श्यामास्वप्न’ की विशेषता उसका कल्पनाशील और काव्यात्मक गद्य है. इसमें प्रकृति-वर्णन, प्रेम, स्वप्न, भावुकता और कल्पना का सुंदर समन्वय मिलता है. गद्य और पद्य के मिश्रित प्रयोग तथा प्रकृति के काव्यमय चित्रण के कारण यह रचना हिंदी के आरंभिक उपन्यास-साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाती है. इस लिहाज से ‘श्यामास्वप्न’ हिंदी के आरंभिक कल्पना-प्रधान और काव्यात्मक उपन्यासों में महत्त्वपूर्ण और प्रथम कृति है.
इस उपन्यास को इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए कि शिवरीनारायण जैसे अपेक्षाकृत छोटे साहित्यिक केंद्र से हिंदी गद्य में कल्पनाशीलता और प्रकृति-संवेदना की एक अलग और नई आवाज सामने आई.
पं. जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ : हिंदी छंदशास्त्र मर्मज्ञ

हिन्दी में छत्तीसगढ़ से जुड़ा एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण नाम पं. जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ (1859-1945) का है. उनका संबंध बिलासपुर से रहा और हिंदी साहित्य में उनकी सबसे बड़ी पहचान छंदशास्त्री के रूप में बनी.
उनकी प्रसिद्ध कृति ‘छंदःप्रभाकर’ का प्रकाशन 1894 में हुआ. यह हिंदी छंदशास्त्र की पहली और व्यवस्थित और महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में गिनी जाती है. इस ग्रंथ में छंदों के स्वरूप, मात्रा, वर्ण, गति, यति आदि को व्यवस्थित ढंग से समझाया गया. इस प्रकार भानुकवि ने हिंदी कविता की रचना-पद्धति और उसके शास्त्रीय आधार को व्यवस्थित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई इसलिए उन्हें हिंदी का प्रथम प्रमुख आधुनिक छंदशास्त्री/साहित्यशास्त्री कहा जाता है. उन्होंने अंग्रेज़ी और ऊर्दू में भी कई किताबें लिखीं.
जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ ने न सिर्फ छंद शास्त्र लिखा बल्कि पंचामृत रामायण/नवपंचामृत रामायण (1897), काव्यप्रभाकर (1909), छंद सारावली (1917), अलंकार प्रश्नोत्तरी (1918), हिंदी काव्यालंकार (1918), काव्य प्रबंध, काव्य कुसुमांजलि, रस रत्नाकर, अलंकार दर्पण, तुलसी तत्व प्रकाश, तुलसी भाव प्रकाश आदि पुस्तकें भी लिखीं.
बिलासपुर में 1913 में उन्होंने ‘जगन्नाथ प्रेस’ नामक छापाखाना भी शुरू किया, जिसने स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों को बल दिया. उनकी विद्वत्ता के कारण उन्हें ‘महामहोपाध्याय’ की उपाधि मिली थी.
माधवराव सप्रे : पत्रकारिता, और आधुनिक कहानी के स्तम्भ

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में छत्तीसगढ़ की हिंदी साहित्यिक भूमिका को व्यापक बनाने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों में माधवराव सप्रे (1871-1926) का नाम आता है.
2 जनवरी 1900 से पेंड्रा क्षेत्र से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. सप्रे इसके निर्माण और संपादन से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों में थे. वामनराव लाखे और रामराव चिंचोलकर भी इसके साथ जुड़े थे. पत्रिका ने साहित्य के साथ-साथ सामाजिक सुधार, शिक्षा, स्त्री-स्थिति और राष्ट्रीय चेतना जैसे विषयों को स्थान दिया. आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह पत्रिका लगभग तीन वर्ष से पहले ही बंद हो गई.
‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का महत्त्व केवल एक स्थानीय पत्रिका के रूप में नहीं है. इसने उस समय हिंदी पत्रकारिता को एक ऐसे क्षेत्र से आवाज दी, जिसे साहित्य के प्रमुख केंद्रों की दृष्टि से प्रायः हाशिए पर समझा जाता था.
सप्रे की साहित्यिक पहचान को विशेष महत्त्व ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से मिला. यह कहानी अप्रैल 1901 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित हुई थी. इस कहानी को हिंदी की पहली मौलिक/आधुनिक कहानी माना जाता है क्योंकि इसमें सामाजिक विषमता, भूमि, अधिकार और मानवीय संवेदना को कथा के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है. इस प्रकार सप्रे के माध्यम से छत्तीसगढ़ का योगदान पत्रकारिता से कथा-साहित्य और सामाजिक जागरण तक फैलता है.
लोचन प्रसाद पांडेय : हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य के सेतु

इसी कालखंड में पं. लोचन प्रसाद पांडेय (1887-1959) का व्यक्तित्व सामने आता है. उनकी साहित्यिक सक्रियता बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में विशेष रूप से दिखाई देती है. उनका साहित्य केवल कविता तक सीमित नहीं था. ‘कलिकाल’ (1905), ‘दो मित्र’ (1906), ‘नीति कविता’ (1909), ‘कविता कुसुममाला’ (1910), ‘माधव मंजरी’ (1914) और ‘जीवन ज्योति’ (1920) जैसी रचनाएँ उनके बहुविध साहित्यिक व्यक्तित्व का परिचय देती हैं.
लोचन प्रसाद पांडेय की कविता पर तत्कालीन द्विवेदीयुगीन चेतना का प्रभाव दिखाई देता है. उनकी रचनाओं में नैतिकता, सामाजिक सुधार, चरित्र-निर्माण, राष्ट्रीयता और लोकमंगल की भावना प्रमुख है. उनकी अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत स्पष्ट और इतिवृत्तात्मक है.
इस दृष्टि से वे हिंदी कविता में उस संक्रमण को समझने में सहायक हैं जिसमें कविता केवल श्रृंगार और मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन के प्रश्नों से जुड़ रही थी इसलिए लोचन प्रसाद पांडेय का महत्त्व केवल 'छत्तीसगढ़ के कवि' के रूप में नहीं, बल्कि द्विवेदी युगीन हिंदी की सामाजिक-सुधारवादी चेतना को छत्तीसगढ़ के साहित्यिक परिवेश से जोड़ने वाले बहुविध रचनाकार के रूप में है.
कामता प्रसाद गुरु : हिंदी व्याकरण के निर्माणकर्ता

आरंभिक हिंदी के विकास में साहित्यिक रचना जितनी आवश्यक थी, भाषा को व्यवस्थित और मानकीकृत करने का कार्य भी उतना ही आवश्यक था. इसके लिए माधवराव सप्रे और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुरोध/प्रयास से रायपुर में शिक्षक पद कार्यरत कामता प्रसाद ‘गुरु’ (1875 -1947) को ‘हिन्दी व्व्याकरण’ लिखने का कार्य सौंपा गया था. इससे पहले रायपुर में उनके आरंभिक कार्य के रूप में ‘भाषा वाक्य शुद्धिकरण’ (1900) का उल्लेख मिलता है.
उनकी प्रसिद्ध कृति ‘हिंदी व्याकरण’ पर 14 अक्टूबर 1920 को काशी नागरीप्रचारिणी सभा की एक व्याकरण संशोधन समिति ने कामता प्रसाद गुरु के व्याकरण पर काम आरंभ किया. इस समिति में उस समय के अनेक बड़े विद्वान जैसे- महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र, लज्जाशंकर झा, जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, कामता प्रसाद गुरु आदि थे. समिति द्वारा संशोधन के बाद संवत् 1920 में ‘हिंदी व्याकरण” प्रकाशित हुआ और इसे उस समय का प्रथम सर्वमान्य हिंदी व्याकरण कहा गया.
इसका महत्त्व इसलिए बहुत अधिक है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में हिंदी को एक मानक, व्यवस्थित और शिक्षणोपयोगी व्याकरण की आवश्यकता थी. कामता प्रसाद गुरु का व्याकरण हिंदी भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ. वर्तमान में संसार भर में हिन्दी व्याकरण की किताबों का आधार कामता प्रसाद ‘गुरु’ रचित ‘हिन्दी व्याकरण’ ही है. यहाँ छत्तीसगढ़ का हिन्दी को योगदान साहित्यिक विधाओं से आगे बढ़कर भाषा-विन्यास और व्याकरण के स्तर पर दिखाई देता है.
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी : ‘सरस्वती’ का संपादन

छत्तीसगढ़ की आरंभिक हिंदी साहित्यिक भूमिका का एक और महत्वपूर्ण अध्याय पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (1894-1971) से जुड़ता है. राजनांदगांव-खैरागढ़ अंचल से जुड़े बख्शी ने कविता और कहानी से साहित्यिक जीवन आरंभ किया. उनकी कहानी ‘झलमला’ 1916 में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई.
यह घटना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ‘सरस्वती’ उस समय हिंदी की सर्वाधिक प्रभावशाली साहित्यिक पत्रिकाओं में थी. बाद में बख्शीजी उसी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ के 1920 में सहायक संपादक बने और 1921 में प्रधान संपादक का दायित्व संभाला. वे 1925 तक वे इस पद पर रहे.
इस प्रकार खैरागढ़/राजनांदगांव अंचल से जुड़े एक शिक्षक और साहित्यकार का प्रवेश हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों में हुआ. बख्शी की वास्तविक प्रतिष्ठा आगे चलकर निबंधकार और आलोचक के रूप में अधिक हुई. इसलिए उनका महत्त्व केवल इस बात में नहीं कि उन्होंने ‘सरस्वती’ का संपादन किया, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने हिंदी में आलोचनात्मक और चिंतनपरक गद्य को सुदृढ़ किया.
मुकुटधर पांडेय : छायावाद के प्रथम प्रस्तोता

इस क्रम का सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव 1920 में पं. मुकुटधर पांडेय (1895-1989) के रूप में सामने आता है. उनका जन्म 1895 में बालपुर (रायगढ़) में हुआ था. उन्होंने हिंदी के आधुनिक काव्य-विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जब हिंदी कविता एक नई संवेदना और नए शिल्प की ओर बढ़ रही थी, तब मुकुटधर पांडेय ने जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘श्री शारदा’ में ‘हिंदी में छायावाद’ शीर्षक से लेखमाला लिखी. यह लेखमाला जुलाई, सितंबर, नवंबर और दिसंबर 1920 के अंकों में प्रकाशित हुई बताई जाती है.
हिंदी साहित्येतिहास में ‘छायावाद’ शब्द के व्यवस्थित प्रारंभिक प्रयोग का श्रेय मुकुटधर पांडेय को दिया जाता है. मुकुटधर पांडेय की उपयुक्त पहचान छायावाद के नामकरणकर्ता और आरंभिक आलोचनात्मक व्याख्याकार के रूप में की जा सकती है.
उनकी कविता ‘कुररी के प्रति’ भी जुलाई 1920 में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई और आरंभिक छायावादी काव्य के संदर्भ में उसका उल्लेख मिलता है. हम देखते हैं की यहाँ आकर छत्तीसगढ़ का योगदान हिंदी के आरंभिक आधुनिक साहित्य से आगे बढ़कर नई काव्य-चेतना के आगमन और उसकी पहचान तक पहुँचता है.
इस तरह हिन्दी की 1885 से 1920 तक की यात्रा को देखें जो की आधुनिक हिन्दी का शैशवकाल था, छत्तीसगढ़ का हिंदी साहित्य में योगदान किसी एक लेखक या एक रचना की उपलब्धि नहीं दिखाई देता बल्कि यह क्रम धीरे-धीरे विस्तृत होता हुआ अनेक विधाओं को अपने भीतर समेट लेता है.
इस प्रकार आरंभिक आधुनिक हिंदी के निर्माण में छत्तीसगढ़ की भूमिका हिंदी को कल्पना-प्रधान गद्य, छंदशास्त्र, पत्रकारिता, कहानी, सामाजिक चेतना, कविता, व्याकरण, आलोचना और नई काव्य-चेतना, इन अनेक स्तरों पर योगदान मिला. इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ का अवदान हिंदी के मुख्य प्रवाह से बाहर खड़ी किसी परिधीय गतिविधि का नाम नहीं, बल्कि हिंदी के आधुनिक स्वरूप के निर्माण की समानांतर और महत्त्वपूर्ण धारा है.