इलाहाबाद हाई कोर्ट: BNS की धारा 69 में 'महिला' के अंतर्गत ट्रांसवुमन शामिल नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: BNS की धारा 69 के तहत 'महिला' शब्द में ट्रांसवुमन शामिल नहीं, आरोपी को मिली जमानत.
प्रयागराज । डेस्क: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत इस्तेमाल किए गए 'महिला' शब्द में ट्रांसजेंडर महिला शामिल नहीं है. यह धारा शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने के अपराध से संबंधित है. इस कानूनी स्पष्टता के साथ अदालत ने एक ट्रांसवुमन के साथ धोखाधड़ी के आरोपी व्यक्ति को जमानत दे दी.
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत ट्रांसजेंडर समुदाय की अपनी एक स्वतंत्र और अलग पहचान है. अदालत ने टिप्पणी की कि सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी (SRS) के माध्यम से अपनी शारीरिक संरचना में बदलाव कराने के बावजूद, किसी व्यक्ति को कानूनन ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला के रूप में ही माना जाएगा, न कि जन्मजात महिला के रूप में. BNS की धारा 69 में प्रयुक्त 'महिला' शब्द केवल जैविक या मानव महिला के लिए लागू होता है.
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने 2023 में संसद में अपनी सिफारिश पेश की थी, जिसमें ट्रांसवुमन को बलात्कार और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों के दायरे में लाने के लिए संशोधन का सुझाव दिया गया था. हालांकि, संसद ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि विधायिका का इरादा BNS के तहत महिला शब्द में ट्रांसवुमन को शामिल करना नहीं था.
यह मामला बरेली का है, जहां एक ट्रांसवुमन ने आरोपी पर आरोप लगाया था कि उसने लगभग डेढ़ साल तक शादी का झूठा वादा करके उसके साथ यौन संबंध बनाए और उससे 5 लाख रुपये से अधिक की राशि ऐंठ ली.
बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ था और सर्जरी के बाद भी मेडिकल बोर्ड ने उसे जैविक महिला नहीं माना. इसके अलावा, पीड़िता ने औपचारिक रूप से अपना लिंग परिवर्तन दर्ज कराने के लिए भी आवेदन नहीं किया था.
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही BNS की धारा 69 इस मामले में लागू नहीं होती, लेकिन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए विशेष कानून मौजूद हैं. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18(d) के तहत किसी भी प्रकार का यौन या शारीरिक शोषण दंडनीय अपराध है, जिसमें अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान है.
इन कानूनी तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया धारा 69 BNS का मामला नहीं बनता है और आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी कर दिया.