मृत बेटे के शुक्राणु पर मां का दावा, बॉम्बे हाईकोर्ट में केंद्र का विरोध
मुंबई । डेस्क: एक मां की भावनात्मक अपील और कानून की सख्त धाराओं के बीच फंसा एक संवेदनशील मामला इन दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट में विचाराधीन है. 55 वर्षीय एक महिला अपने दिवंगत बेटे द्वारा जीवनकाल में फ्रीज़ कराए गए शुक्राणु (क्रायोप्रिज़र्व्ड स्पर्म) को आईवीएफ प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं. लेकिन केंद्र सरकार ने इस मांग को कानून के खिलाफ बताते हुए हाईकोर्ट से याचिका खारिज करने की अपील की है.
महिला के बेटे की मृत्यु पिछले वर्ष 16 फरवरी को बीमारी के कारण हुई थी. युवक अविवाहित था और उसने अपनी मृत्यु से पहले शुक्राणु फ्रीज़ कराए थे. बेटे की मौत के बाद मार्च 2025 से ही मां ने उस फ्रीज़ किए गए शुक्राणु को वापस पाने की कोशिश शुरू की. उनका तर्क है कि वह उसी जैविक सामग्री के जरिए वंश आगे बढ़ाना चाहती हैं.
सबसे पहले उन्होंने महाराष्ट्र की सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) प्राधिकरण से संपर्क किया, लेकिन वहां से स्पष्ट कर दिया गया कि फ्रीज़ किए गए शुक्राणु किसी अन्य व्यक्ति को सौंपे नहीं जा सकते. इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सहायक प्रजनन तकनीक एवं सरोगेसी बोर्ड से संपर्क करने को कहा गया. हालांकि, राष्ट्रीय बोर्ड ने 6 मई 2025 को उनका आवेदन खारिज कर दिया.
इसके बाद महिला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचीं. जून 2025 में हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा कि मामले के अंतिम निपटारे तक फ्रीज़ किए गए शुक्राणु को नष्ट नहीं किया जाएगा और उसे यथास्थिति में सुरक्षित रखा जाए. अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि यदि सुनवाई के दौरान शुक्राणु नष्ट हो गए, तो याचिका का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा.
इस मामले को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि युवक अविवाहित था, उसने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी और अब सवाल यह है कि उसकी मृत्यु के बाद उसके फ्रीज़ किए गए शुक्राणु का भविष्य क्या होगा.
हाल ही में केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में महिला की याचिका को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, एआरटी कानून के तहत शुक्राणु फ्रीज़ कराते समय एक सहमति-पत्र भरना अनिवार्य होता है. इस फॉर्म में यह भी दर्ज किया जाता है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद फ्रीज़ किए गए शुक्राणु का क्या किया जाएगा. केंद्र का दावा है कि युवक ने स्पष्ट रूप से यह सहमति दी थी कि उसकी मृत्यु के बाद शुक्राणु नष्ट कर दिए जाएं.
केंद्र ने यह भी दलील दी कि सरोगेसी कानून के तहत फ्रीज़ किए गए शुक्राणु को किसी अन्य क्लिनिक में स्थानांतरित करने की अनुमति नहीं है. साथ ही, एआरटी अधिनियम की धारा 29 और 30 का हवाला देते हुए कहा गया कि फ्रीज़ किए गए शुक्राणु को किसी अन्य व्यक्ति को देना, बेचना या बिना राष्ट्रीय बोर्ड की अनुमति के स्थानांतरित करना पूरी तरह प्रतिबंधित है. विदेश ले जाना भी कानूनन अपराध है.
केंद्र सरकार का कहना है कि मृत व्यक्ति की मरणोत्तर शुक्राणु-उपयोग के लिए कोई वैध सहमति मौजूद नहीं है, बल्कि इसके विपरीत स्पष्ट निर्देश हैं कि मृत्यु के बाद उसे नष्ट किया जाए. ऐसे में मां को उस शुक्राणु पर कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया जा सकता.
पिछले दिसंबर में इस मामले की सुनवाई समय के अभाव में पूरी नहीं हो सकी थी. हाईकोर्ट ने संकेत दिया है कि मामले की अगली सुनवाई फरवरी में होगी. यह मामला न सिर्फ एक मां की व्यक्तिगत पीड़ा से जुड़ा है, बल्कि भविष्य में मरणोत्तर प्रजनन अधिकारों और जैविक सामग्री पर स्वामित्व जैसे गंभीर कानूनी सवालों की दिशा भी तय कर सकता है.