बांग्लादेश में खसरे से हाहाकार: 1,002 बच्चों की मौत, 1.87 लाख संक्रमित
नई दिल्ली । डेस्क: बांग्लादेश इस समय खसरे (मीजल्स) के वैश्विक इतिहास के सबसे भयावह दौर से गुजर रहा है. स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, देश में जारी इस जानलेवा प्रकोप के कारण अब तक कम से कम 1,002 बच्चों की जान जा चुकी है. डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल मार्च में शुरू हुए इस प्रकोप के बाद से अब तक 1,87,484 से अधिक खसरे के मामले दर्ज किए जा चुके हैं.
बांग्लादेश में दर्ज खसरे के मामलों के आधार पर मृत्यु का प्रतिशत 0.53% (लगभग 0.5344%) है. इस आंकड़े के अनुसार, खसरे से संक्रमित प्रत्येक 10,000 मरीजों में से लगभग 53 मरीजों की जान गई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश के इतिहास में खसरे के कारण इतने बच्चों की मौत और इतने व्यापक स्तर पर संक्रमण पहले कभी नहीं देखा गया. इस संकट की मुख्य वजह टीकाकरण कार्यक्रम में आई गिरावट को माना जा रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) के अनुसार, 2024 और 2025 के दौरान देश में हुई राजनीतिक उथल-पुथल के कारण नियमित टीकाकरण अभियान बुरी तरह प्रभावित हुआ था, जिससे देश भर में लगभग 40 लाख बच्चे वैक्सीन से वंचित रह गए.
खसरा एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी है जो छोटे बच्चों और शिशुओं को सबसे तेजी से अपनी चपेट में लेती है. इसके गंभीर मामलों में मस्तिष्क में सूजन और सांस लेने में गंभीर तकलीफ जैसी जानलेवा स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं.
हालांकि अप्रैल में शुरू किए गए आपातकालीन टीकाकरण अभियान के तहत 1.8 करोड़ बच्चों को टीका लगाया गया, लेकिन 'हर्ड इम्युनिटी' हासिल न हो पाने के कारण संक्रमण की रफ्तार थमी नहीं है. ऊपर से अस्पतालों पर डेंगू के बढ़ते मामलों का भी भारी बोझ है, जिससे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है. स्वास्थ्य विभाग की टीमें अब भी छूटे हुए बच्चों तक वैक्सीन पहुंचाने के प्रयास में जुटी हुई हैं.
खसरा क्या है?
खसरा (Measles) 'मीजल्स वायरस' (Paramyxovirus परिवार) के कारण होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक और गंभीर श्वसन रोग है. यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बात करने पर हवा में फैलने वाली छोटी-छोटी बूंदों (Respiratory Droplets) के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है.
यह बीमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है, लेकिन 5 वर्ष से कम उम्र के छोटे बच्चे, कुपोषित बच्चे और ऐसे लोग जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर होती है, वे इसके सबसे आसान शिकार बनते हैं. जिन बच्चों को खसरे का टीका नहीं लगा होता, उनमें इसके संक्रमण का जोखिम सबसे अधिक होता है.
खसरे के शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, खांसी, बहती नाक, गले में खराश और आंखें लाल होना या पानी आना शामिल हैं. बीमारी के 2 से 4 दिन बाद चेहरे और गर्दन पर लाल-लाल चकत्ते या दाने (Rash) निकलने शुरू होते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैल जाते हैं. कुछ मरीजों के मुंह के अंदर छोटे-छोटे सफेद धब्बे (Koplik's spots) भी दिखाई देते हैं. गंभीर मामलों में यह बीमारी न्यूमोनिया, कान में इन्फेक्शन, दस्त और मस्तिष्क में सूजन (Encephalitis) जैसी गंभीर जटिलताओं का रूप ले सकती है.
खसरे से मृत्यु की दर सामान्य परिस्थितियों में लगभग 0.1% से 0.2% (यानी 1,000 में से 1 या 2 मरीज) होती है. हालांकि, जहां कुपोषण अधिक हो, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी हो या कोई बड़ा प्रकोप फैला हो, वहां मृत्यु दर बढ़कर 1% से 5% या उससे भी अधिक हो सकती है.
खसरे को शत-प्रतिशत टीकाकरण के माध्यम से पूरी तरह रोका जा सकता है. इसके लिए खसरे का टीका (MMR या MR वैक्सीन) दो खुराकों में दिया जाता है. पहली खुराक आमतौर पर 9 से 12 महीने की उम्र में और दूसरी खुराक 16 से 24 महीने की उम्र में दी जाती है. टीकाकरण से शरीर में इस वायरस के खिलाफ मजबूत प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है, जिससे न केवल बच्चा सुरक्षित रहता है बल्कि समाज में 'हर्ड इम्युनिटी' (Herd Immunity) बनने से इसका फैलाव भी रुक जाता है.