लोकपाल का निराशाजनक प्रदर्शन: जन शिकायतों में रिकॉर्ड गिरावट
नई दिल्ली । डेस्क: देश की भ्रष्टाचार-विरोधी शीर्ष संस्था लोकपाल ऑफ इंडिया अपनी कार्रवाई और जन-भागीदारी के निराशाजनक रिकॉर्ड के कारण सवालों के घेरे में आ गई है. संस्था द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, भ्रष्टाचार की शिकायतों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई है, जबकि गंभीर मामलों में कार्रवाई बेहद धीमी रही है.
हाल ही में देश की भ्रष्टाचार-रोधी शीर्ष संस्था लोकपाल ऑफ इंडिया विवादों के केंद्र में आ गई है. इस विवाद का कारण है संस्था द्वारा अपने अध्यक्ष और सदस्यों के लिए सात लग्जरी बीएमडब्ल्यू 3 सीरीज 330एलआई कारों की खरीद के लिए जारी किया गया टेंडर. 16 अक्टूबर को जारी इस टेंडर ने सार्वजनिक आक्रोश को भड़का दिया है.
जन शिकायतें रिकॉर्ड निचले स्तर पर
लोकपाल, जिसका उद्देश्य प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों तक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करना है, के पास आने वाली शिकायतों की संख्या में तेज गिरावट आई है:
गिरावट का सिलसिला: 2022-23 में शिकायतों की संख्या 2,469 के चरम पर थी, जो घटकर सितंबर 2025 तक मात्र 233 रह गई है. यह जन-भागीदारी में एक तीखी गिरावट को दर्शाता है.
कुल मामले: लोकपाल को 2019-20 में काम शुरू होने के बाद से अब तक कुल 6,955 शिकायतें मिली हैं. इनमें से लगभग 90% शिकायतें पहले चार वर्षों में प्राप्त हुईं, जबकि पिछले तीन वर्षों में केवल 691 शिकायतें मिली हैं.
मामूली कार्रवाई और पारदर्शिता का अभाव
संस्था के कार्य प्रदर्शन पर सबसे गंभीर सवाल तब उठते हैं जब कार्रवाई के आंकड़ों को देखा जाता है.
लोकपाल ने अब तक प्राप्त कुल शिकायतों में से केवल 289 मामलों में ही प्रारंभिक जांच के आदेश दिए हैं.
अभियोजन की मंजूरी सिर्फ सात मामलों में दी गई है, जो शीर्ष स्तर के भ्रष्टाचार की जांच के मूल उद्देश्य के विपरीत है.
आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने लोकपाल की आलोचना करते हुए कहा, "लोकपाल को बड़े भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाया गया था. मगर, इन वर्षों में इसने किसी भी महत्वपूर्ण मामले में अभियोजन की मंजूरी नहीं दी है. अधिकांश शिकायतें तकनीकी कमियों, जैसे कि प्रारूप त्रुटियों, के आधार पर खारिज की जा रही हैं, जिससे गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप अनसुलझे रह जाते हैं."
संस्थागत विकास में सुस्ती
भारद्वाज ने लोकपाल की जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए. उन्होंने बताया कि:
लोकपाल ने 2021-22 के बाद से कोई वार्षिक रिपोर्ट अपलोड नहीं की है, जिससे संस्था के कामकाज पर सार्वजनिक निगरानी बाधित हुई है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लोकपाल कानून बनने के बारह साल बाद, संस्था की अभियोजन शाखा (Prosecution Wing) को जून 2025 में ही अधिसूचित किया गया.
आरटीआई कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश बत्रा (सेवानिवृत्त) ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, भ्रष्टाचार-रोधी निकाय होने के नाते लोकपाल को "सादगी और मितव्ययिता" का उदाहरण पेश करना चाहिए.
संक्षेप में, लोकपाल अपनी धीमी कार्रवाई, शिकायत निपटान में तकनीकी बाधाओं और पारदर्शिता की कमी के कारण एक प्रभावी भ्रष्टाचार-रोधी प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका निभाने में विफल होता दिख रहा है.
1. लोकपाल और लोकायुक्त के बीच अंतर
लोकपाल (Lokpal): यह केंद्र सरकार के स्तर पर भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों की जांच करता है.
लोकायुक्त (Lokayukta): यह संबंधित राज्य सरकार के स्तर पर भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों की जांच करता है. लोकायुक्त का अधिकार क्षेत्र और शक्तियाँ अलग-अलग राज्यों के अपने-अपने लोकायुक्त अधिनियमों द्वारा निर्धारित होती हैं.
2. महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक पहलू
शिकायत का निपटारा (Complaint Disposal): लोकपाल के पास शिकायत प्राप्त होने पर उसे शुरू में खारिज करने, प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) का आदेश देने, या जांच एजेंसी (जैसे CBI) को सौंपने का अधिकार होता है.
प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry - P.I.): यह जांच केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) या किसी अन्य एजेंसी द्वारा की जाती है. यदि P.I. में प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार का मामला पाया जाता है, तो लोकपाल पूर्ण जांच (Investigation) का आदेश दे सकता है.
जांच (Investigation): पूर्ण जांच का कार्य मुख्य रूप से CBI या लोकपाल द्वारा निर्देशित किसी अन्य एजेंसी द्वारा किया जाता है.
अभियोजन (Prosecution): जांच पूरी होने के बाद, लोकपाल के पास आरोपी अधिकारी पर मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन की मंजूरी देने का अधिकार होता है.
3. लोकपाल की कानूनी चुनौतियाँ
जनता के लिए लोकसेवकों की संपत्ति की घोषणा (Assets Declaration): अधिनियम में लोकसेवकों और उनके आश्रितों के लिए अपनी संपत्ति और देनदारियों को सार्वजनिक रूप से घोषित करना अनिवार्य किया गया था. इस प्रावधान को लेकर पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच अक्सर बहस होती रही है.
सीबीआई पर नियंत्रण: लोकपाल को CBI की जांच इकाइयों पर अधीक्षण और निर्देश देने की शक्तियाँ प्राप्त हैं, खासकर उन मामलों में जो लोकपाल को सौंपे गए हैं. यह शक्ति CBI की स्वतंत्रता और जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण है.
4. अन्य भ्रष्टाचार-रोधी निकाय
लोकपाल के साथ-साथ, भारत में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अन्य प्रमुख संस्थाएं भी हैं:
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC): इसका कार्य केंद्र सरकार के अधिकारियों के विरुद्ध सतर्कता (Vigilance) की देखरेख करना है.
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI): यह केंद्र सरकार की प्रमुख जांच एजेंसी है, जो भ्रष्टाचार सहित विभिन्न गंभीर आपराधिक मामलों की जांच करती है.
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG): यह सरकारी खर्चों का ऑडिट करता है और वित्तीय अनियमितताओं को उजागर करता है.