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ननों की रिहाई: क्या केरल भाजपा को राजनीतिक लाभ होगा?

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06 अग. 2025, 02:30 AM 4 मिनट में पढ़ें 2

केरल भाजपा
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तिरुवनंतपुरम । डेस्क: छत्तीसगढ़ में नौ दिनों की कैद के बाद दो कैथोलिक ननों की रिहाई ने न केवल चर्च बल्कि केरल इकाई की भारतीय जनता पार्टी के लिये भी राहत की सांस लाई है. इस घटना ने केरल में एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था, जिसमें वामपंथी दल, कांग्रेस और विभिन्न संगठनों ने भाजपा के खिलाफ तीखा अभियान चलाया था.


अब, ननों की जमानत में भाजपा की सक्रिय भूमिका के बाद, कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस प्रकरण से भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलेगा.


दो ननों और उनके एक सहयोगी को छत्तीसगढ़ में गंभीर गैर-जमानती आरोपों में गिरफ्तार किया गया था. इस गिरफ्तारी ने केरल के ईसाई समुदाय में तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन और न्याय की मांग उठी. स्थानीय अदालत ने शुरू में ननों की जमानत याचिका खारिज कर दी और मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसने आरोपों की गंभीरता को लेकर चिंतायें बढ़ा दीं.


इस बीच, केरल भाजपा ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और ननों को निर्दोष बताया. भाजपा केरल अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) के अध्यक्ष आर्चबिशप एंड्रयूज से मुलाकात की और जमानत के लिये पूर्ण समर्थन का वादा किया. सूत्रों के अनुसार, ननों की रिहाई में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की हस्तक्षेप की महत्वपूर्ण भूमिका थी.


पीएमओ का हस्तक्षेप इसलिये हुआ क्योंकि ईसाई समुदाय से नजदीकी बढ़ाने का विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का था, जिसका लक्ष्य आगामी चुनावों में लाभ उठाना था. केरल में ईसाई वोट महत्वपूर्ण हैं, और भाजपा नेतृत्व यह अच्छी तरह जानता है कि हाल ही में त्रिशूर लोकसभा सीट पर उनकी जीत में ईसाई समुदाय का समर्थन भी शामिल था.


ईसाई समुदाय के साथ भाजपा का रिश्ता


ननों की गिरफ्तारी ने भाजपा की केरल में ईसाई समुदाय के साथ हाल के वर्षों में बनी नजदीकी को हिलाकर रख दिया था. भाजपा ने इस समुदाय के समर्थन की आवश्यकता को समझते हुये त्वरित कदम उठाये. भाजपा की राज्य इकाई ने निष्कर्ष निकाला कि धर्मांतरण के प्रयासों का कोई सबूत नहीं था, और इसके बाद राज्य महासचिव अनूप एंटनी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने ननों की सहायता के लिये छत्तीसगढ़ का दौरा किया.


आर्चबिशप एंड्रयूज ने केंद्र सरकार की भूमिका के लिये सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया, जिसे कई लोगों ने भाजपा की भागीदारी के समर्थन के रूप में देखा. सोमवार को केरल के ईसाई नेताओं ने भाजपा के राज्य समिति कार्यालय ‘मरारजी भवन’ में केक लेकर पहुंचकर राजीव चंद्रशेखर के प्रयासों के लिए आभार जताया. यह दर्शाता है कि भाजपा इस मामले में केवल एक दर्शक नहीं थी, बल्कि ननों की रिहाई में सक्रिय सहायक थी.


केरल के कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह प्रकरण भाजपा के ईसाई समुदाय के साथ संबंधों को और मजबूत करने में उत्प्रेरक साबित हो सकता है. 2026 के विधानसभा चुनावों को देखते हुये, भाजपा इस मामले को ईसाई समुदाय के “रक्षक” के रूप में अपनी छवि बनाने के लिए उपयोग कर सकती है. पार्टी की रणनीति में मुस्लिम और कम्युनिस्टों को विरोधी और कांग्रेस को अक्षम के रूप में चित्रित करने की कोशिश शामिल है.


हालांकि, कुछ पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि यह प्रकरण भाजपा शासित राज्यों में ईसाई उत्पीड़न के व्यापक पैटर्न को नजरअंदाज करता है. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में 35 पादरियों के जेल में होने की खबरें हैं, और छत्तीसगढ़ व ओडिशा में ईसाइयों की गिरफ्तारी, हाउस चर्चों का बंद होना और प्रार्थना सभाओं पर हमले जारी हैं. फिर भी, प्रमुख चर्च नेताओं और राजनीतिक हस्तियों ने इन मुद्दों पर चुप्पी साध रखी है.


आलोचना और चुनौतियां


कुछ लोग इस घटना को 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा की रणनीति के हिस्से के रूप में देखते हैं. हालांकि, भाजपा और अन्य संगठनों के एक वर्ग का मानना है कि ननों की रिहाई के लिये किये गये प्रयासों ने हिंदू समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है. कई संगठनों ने राजीव चंद्रशेखर के प्रयासों की सार्वजनिक रूप से निंदा की और कहा कि जब भी भाजपा अपने मूल हिंदुत्व विचारधारा से समझौता करती है, उसके कार्यकर्ता और हिंदू समुदाय इसके खिलाफ वोट करते हैं.


कैथोलिक चर्च, जो राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक हितों को देखता है, ने इस मामले में “उच्च स्थानों पर मित्रों” की आवश्यकता को दोहराया है. ननों की रिहाई ने राजीव चंद्रशेखर की दिल्ली के सत्ता गलियारों से नजदीकी को भी साबित किया.


केरल में ईसाई समुदाय इस पूरे प्रकरण को कैसे देखता है, यह महत्वपूर्ण होगा. साथ ही, धर्मांतरण विरोधी कानूनों और धार्मिक उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चर्च की चुप्पी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं. 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ, यह छत्तीसगढ़ प्रकरण केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक स्क्रिप्ट के रूप में याद किया जा सकता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP