क्या भारतीय मध्यम वर्ग की जेब पर हावी हो रहा है डॉलर?
नई दिल्ली । डेस्क: विदेशों में छुट्टियां मनाना, विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्री लेना, एआई (AI) टूल्स का सब्सक्रिप्शन और प्रीमियम गैजेट्स खरीदना ये सब अब भारतीय मध्यम वर्ग की जीवनशैली का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं. इकोनामिक टाइम्स के अनुसार अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जैसे-जैसे भारतीयों की आकांक्षाएं वैश्विक हो रही हैं, वैसे-वैसे भारतीय परिवारों का खर्च विदेशी मुद्राओं, विशेषकर अमेरिकी डॉलर से सीधे जुड़ता जा रहा है. ऐसे में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या भारत की खपत की कहानी अब चुपके से डॉलर-गहन होती जा रही है?
मई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया संकट के कारण विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए भारतीयों से गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने और सोने की खरीद को टालने की अपील की थी. यह अपील केवल एक तात्कालिक कदम नहीं थी, बल्कि इसने भारत की अर्थव्यवस्था में आ रहे एक बड़े संरचनात्मक बदलाव को रेखांकित किया था. आज देश का एक बड़ा और समृद्ध मध्यम वर्ग उन वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च कर रहा है, जिनकी कीमतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से डॉलर से तय होती हैं.
मध्यम वर्ग का तेजी से विस्तार और बदलती आदतें:
भारत में मध्यम वर्ग का दायरा बहुत तेजी से बढ़ रहा है. थिंक टैंक पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी (PRICE) के फरवरी 2025 के एक विश्लेषण के अनुसार, भारत में 6 लाख रुपये से 36 लाख रुपये वार्षिक आय वाले मध्यम वर्ग की आबादी 56 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जो लगभग 12.6 करोड़ परिवारों के बराबर है. इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यह संख्या वर्ष 2030-31 तक 71.5 करोड़ और वर्ष 2046-47 तक 1 अरब को पार कर जाएगी. इतनी बड़ी आबादी का वैश्विक स्तर की सेवाओं पर खर्च करना सीधे तौर पर विदेशी मुद्रा की मांग को प्रभावित कर रहा है.
एक दशक पहले तक भारत में डॉलर की मांग मुख्य रूप से कच्चे तेल के आयात, कॉर्पोरेट ऋण और व्यापार तक सीमित थी. लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है. वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि अब रिटेल उपभोक्ता यानी आम परिवार डॉलर की मांग में बड़ा योगदान दे रहे हैं.
विदेशी यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय शिक्षा, वैश्विक ओटीटी प्लेटफॉर्म, क्लाउड सॉफ्टवेयर और विदेशी ई-कॉमर्स साइट्स ने मिलकर घरेलू बजट का चेहरा बदल दिया है. हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह ट्रेंड अभी रिजर्व बैंक की नीतियों को पूरी तरह प्रभावित नहीं करेगा, क्योंकि विदेशी व्यापार और एफडीआई (FDI) अब भी मुख्य कारक हैं, लेकिन भविष्य के लिए यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है.
विदेशी दौरे अब लग्जरी नहीं, सालाना बजट का हिस्सा
इस बदलाव का सबसे साफ असर पर्यटन क्षेत्र में देखने को मिल रहा है. विदेशी यात्राएं, जिन्हें कभी जीवन में एक या दो बार मिलने वाला अवसर माना जाता था, अब मध्यम वर्ग के सालाना बजट का नियमित हिस्सा बन चुकी हैं. पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में भारतीयों ने रिकॉर्ड 3.28 करोड़ से अधिक विदेशी यात्राएं कीं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.3 प्रतिशत अधिक हैं.
भारतीय रिजर्व बैंक की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत वित्त वर्ष 2026 में भारतीयों ने लगभग 29 अरब डॉलर विदेश भेजे, जिसमें से अकेले यात्रा पर 16.4 अरब डॉलर खर्च किए गए. कई परिवार अब साल में दो बार विदेश घूमने की योजना बना रहे हैं.
इसके पीछे बढ़ता वेतन, आसान वीजा नियम और घरेलू प्रीमियम पर्यटन के मुकाबले विदेशों (जैसे बैंकॉक या मलेशिया) में मिलने वाले सस्ते विकल्प मुख्य कारण हैं. लोग अब विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए पहले से ही विदेशी मुद्रा खरीदकर रखने लगे हैं.
शिक्षा, स्वास्थ्य और अदृश्य 'डॉलर बिल':
विदेशी दौरों के अलावा बच्चों की पढ़ाई भारतीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा वित्तीय संकल्प बनी हुई है. आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में विदेशों में पढ़ाई के लिए 2.3 अरब डॉलर से अधिक की राशि बाहर भेजी गई. इसके साथ ही इलाज के लिए विदेश जाने और भारत में रहते हुए विदेशी चिकित्सा सेवाओं का लाभ उठाने पर भी करोड़ों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं.
इन सबके बीच, एक ऐसा खर्च भी है जो हमें दिखाई नहीं देता, जिसे 'अदृश्य डॉलर बिल' कहा जा सकता है. इसमें आपके फोन में मौजूद स्ट्रीमिंग ऐप्स, क्लाउड स्टोरेज, सॉफ्टवेयर और प्रीमियम एआई टूल्स शामिल हैं.
साल 2025 में डिजिटल सब्सक्रिप्शन से होने वाली आय 60 प्रतिशत बढ़कर 163 अरब रुपये तक पहुंच गई. पेड वीडियो और म्यूजिक सब्सक्रिप्शन लेने वाले परिवारों की संख्या में भारी उछाल आया है. इसके साथ ही, अक्टूबर 2025 तक भारत में सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या 50 करोड़ को पार कर गई है. ये सभी प्लेटफॉर्म प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से डॉलर आधारित मूल्य निर्धारण से जुड़े हुए हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स आयात और विदेशी बाजारों में निवेश:
भारतीय अब घरेलू बाजारों के साथ-साथ विदेशी शेयर बाजारों में भी पैसा लगाने लगे हैं. वित्त वर्ष 2026 में भारतीयों ने विदेशी इक्विटी और ऋण बाजारों में 2.65 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया. मार्च 2026 में यह निवेश पिछले वर्ष के मुकाबले 43 प्रतिशत बढ़ा है.
दूसरी ओर, भारत ने स्मार्टफोन के मामले में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता लगभग खत्म कर दी है, लेकिन इसके बावजूद देश का कुल इलेक्ट्रॉनिक्स आयात वित्त वर्ष 2026 में पहली बार 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार करते हुए 116.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया. ऐसा इसलिए है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के लिए जरूरी कच्चे माल और अन्य उपकरणों का आयात अब भी बड़े पैमाने पर डॉलर में किया जा रहा है.
विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सीधा असर:
पहले के समय में रुपये और डॉलर के मूल्य में होने वाले बदलावों से केवल आयातक-निर्यातक या अमीर लोग प्रभावित होते थे. लेकिन आज एक आम परिवार का बजट भी इससे प्रभावित होता है. जनवरी 2025 से रुपये में लगभग 9 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है और मई 2026 में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 96.96 के स्तर पर पहुंच गया था.
विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं पर इस गिरावट का ज्यादा असर नहीं पड़ता, क्योंकि लोग इसे टाल नहीं सकते. लेकिन छुट्टियां मनाने, महंगे फोन या लग्जरी सामान खरीदने जैसे स्वैच्छिक खर्चों पर इसका सीधा असर पड़ता है. निष्कर्ष यह है कि भारतीय भले ही रुपये में कमा रहे हैं, लेकिन उनकी आकांक्षाओं की टोकरी अब वैश्विक हो चुकी है, जो तेजी से अमेरिकी डॉलर की चाल के साथ जुड़ती जा रही है.