कम फीस के कारण बांग्लादेश गये भारतीय मेडिकल छात्र डर के साये में
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश में अध्ययनरत भारतीय मेडिकल छात्र इन दिनों भय, असुरक्षा और मानसिक तनाव के साये में जी रहे हैं. शेख हसीना सरकार के पतन के बाद देश में बढ़ी राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और भारत-विरोधी भावनाओं का सीधा असर विदेशी छात्रों, खासकर भारतीयों पर पड़ा है. हालात इतने खराब हो गए हैं कि कई मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल शाम होते ही बंद हो जाते हैं और छात्र खुद को कमरों में कैद करने को मजबूर हैं.
ढाका के बाहरी इलाके में स्थित ईस्ट वेस्ट मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे हरियाणा के छात्र करीम बताते हैं कि वे हर शाम करीब 8 बजे अपने हॉस्टल के कमरे में ताला लगा लेते हैं. बाहर किसी के कदमों या आवाज पर वे पहले पहचानने की कोशिश करते हैं, फिर दरवाजा खोलते हैं. उन्हें डर है कि उनकी भारतीय पहचान या उच्चारण उन्हें निशाना बना सकता है.
करीम अप्रैल 2024 में भारत में सरकारी मेडिकल सीट न मिलने के बाद बांग्लादेश आए थे. शुरुआत में ढाका उन्हें अपनापन देता था, लेकिन जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए छात्र आंदोलन और उसके बाद की हिंसा ने हालात पूरी तरह बदल दिए.
फिलहाल बांग्लादेश में 9,000 से अधिक भारतीय मेडिकल छात्र पढ़ रहे हैं. दिसंबर 2025 में एक भारतीय छात्र पर हुए हमले और उसकी सीसीटीवी फुटेज वायरल होने के बाद छात्रों में दहशत फैल गई. इसके बाद से कई छात्रों ने कैंपस के बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया है. ढाका नेशनल मेडिकल कॉलेज के इंटर्न वैभव कहते हैं, “हम हर दिन डर के साथ जी रहे हैं. अब एक गलत शब्द या गलत पहचान हमें मुसीबत में डाल सकती है.”
छात्रों का कहना है कि वे राजनीति से दूर रहना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा हालात ने उन्हें लगातार खबरें देखने और हालात का अंदाजा लगाने को मजबूर कर दिया है. खासकर हिंदू छात्रों में डर और गहरा है. कुछ छात्रों ने आरोप लगाया कि शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद कॉलेजों में भी उनके साथ व्यवहार बदल गया है.
भारत में महंगी मेडिकल शिक्षा मजबूरी की वजह
हर साल भारत में करीब 20 लाख छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) देते हैं, जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें 60 हजार से भी कम हैं. निजी मेडिकल कॉलेजों में 50 हजार सीटें जरूर हैं, लेकिन वहां की फीस अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच से बाहर है. भारत में निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल फीस 65 लाख से लेकर 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है.
इसी वजह से हजारों छात्र बांग्लादेश, नेपाल, रूस और अन्य देशों का रुख करते हैं. बांग्लादेश में निजी मेडिकल कॉलेजों की कुल फीस अपेक्षाकृत कम है, जो लगभग 30 से 45 लाख रुपये के बीच होती है. करीम जैसे कई छात्रों के लिए यही एकमात्र विकल्प था. उनके पिता, जो सरकारी कर्मचारी हैं, ने लगभग सारी जीवन भर की बचत खर्च कर बेटे को यहां दाखिला दिलाया.
पढ़ाई पर संकट, भविष्य अधर में
राजनीतिक अशांति, इंटरनेट बंदी और लगातार परीक्षाओं के टलने से छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है. कश्मीर के छात्र मोहम्मद बताते हैं कि वे 2024 में स्नातक होने वाले थे, लेकिन कोविड के बाद अब राजनीतिक अस्थिरता ने उनकी डिग्री और भविष्य दोनों को अधर में लटका दिया है.
ऑल इंडिया मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIMSA) का कहना है कि उसे बांग्लादेश से सैकड़ों छात्रों की शिकायतें मिली हैं. संगठन ने प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग की है और जरूरत पड़ने पर छात्रों की सुरक्षित वापसी पर भी विचार करने को कहा है.
बांग्लादेश सरकार हालांकि दावा कर रही है कि कानून-व्यवस्था नियंत्रण में है और चुनाव से पहले अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं. लेकिन छात्रों का कहना है कि जमीनी हकीकत अलग है.
करीम के शब्दों में, “पहले कॉलेज दूसरा घर लगता था, अब जेल जैसा महसूस होता है. हम पढ़ाई छोड़ भी नहीं सकते और डर के साथ जीने को मजबूर हैं.”
भारतीय मेडिकल छात्रों के लिए बांग्लादेश कभी उम्मीद की जगह था, लेकिन आज वही मजबूरी और भय का पर्याय बनता जा रहा है.