अमेरिका-भारत व्यापार सौदे में जैव-ईंधन बनी बाधा, कैसे ?
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और भारत के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत में जैव-ईंधन बाजार तक अमेरिकी पहुंच एक बड़ा गतिरोध बन गई है. अमेरिका, भारत से अपने ऊर्जा बाजार, विशेष रूप से तरल पेट्रोलियम गैस (LPG) और संभावित रूप से जैव-ईंधन क्षेत्र तक पहुंच की मांग कर रहा है, जिसे वह 50% आयात शुल्क में कटौती के लिए एक पूर्व शर्त के रूप में देख सकता है. यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत रूसी कच्चे तेल से दूरी बनाता दिख रहा है.
भारत की सरकारी रिफाइनरियां पहले ही मध्य पूर्व के आपूर्तिकर्ताओं के बजाय अमेरिका से अधिक एलपीजी खरीदने की योजना बना रही हैं और नई दिल्ली अमेरिकी एलपीजी खरीद को शुल्क-मुक्त करने के लिए भी तैयार है. हालांकि, जब अमेरिकी वार्ताकार भारत के कसकर नियंत्रित जैव-ऊर्जा बाजार को खोलने की कोशिश करते हैं तो मामला पेचीदा हो जाता है.
भारत सालाना 10 अरब लीटर इथेनॉल को गैसोलीन के साथ मिलाता है, और 2050 तक इस मांग के दोगुना होने की उम्मीद है. अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि ने 2025 की अपनी रिपोर्ट में नोट किया है कि भारत ईंधन उपयोग के लिए इथेनॉल के आयात पर रोक लगाता है, जिस पर अमेरिका ने असंतोष व्यक्त किया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जैव-ईंधन पर कोई भी रियायत देना एक मुश्किल फैसला होगा. एक तरफ, मोटर चालकों में इथेनॉल सम्मिश्रण के सरकार के आक्रामक जनादेश को लेकर इंजन दक्षता में कमी और रखरखाव लागत में वृद्धि की शिकायतें हैं. लेकिन असली और बड़ी चुनौती ग्रामीण क्षेत्रों से आएगी.
भारत के जैव-ईंधन कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत प्रदान करना भी है. अनुमान है कि गन्ने के रस, शीरा, मक्का, धान के पुआल, कपास के डंठल और बांस को इथेनॉल डिस्टिलर्स को बेचकर किसानों को 1.18 ट्रिलियन रुपये ($13.4 बिलियन) का लाभ हुआ है. एक बार ऊर्जा उत्पादक के रूप में सफलता का स्वाद चख चुके भारतीय किसान, विदेशी प्रतिस्पर्धा के कारण अपनी इस आय को खोना नहीं चाहेंगे और किसी भी ऐसे व्यापार समझौते का विरोध कर सकते हैं जो उनके मुनाफे को प्रभावित करे.
उत्तर भारत के प्रमुख अनाज उत्पादक राज्यों में 2027 तक होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, प्रधानमंत्री मोदी किसानों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेंगे. किसानों ने पहले भी उनके आर्थिक कार्यक्रमों का विरोध किया है और उन्हें दो बार कानून वापस लेने के लिए मजबूर किया है. इसलिए, अमेरिकी व्यापार सौदे में जैव-ईंधन पर रियायत देना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा साबित हो सकता है.