संतानहीनता छिपाना क्रूरता, तलाक सही- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि विवाह से पहले अपने जीवनसाथी से गर्भधारण की क्षमता को प्रभावित करने वाली चिकित्सा स्थिति को छिपाना हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह विच्छेद (तलाक) का एक वैध आधार है.जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने कवर्धा फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा और पत्नी की अपील को खारिज कर दिया.
हालांकि, कोर्ट ने पति को निर्देश दिया है कि वह पत्नी को एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में पाँच लाख रुपये का भुगतान करे. यह मामला वर्ष 2015 में हुए विवाह से संबंधित था. पति (वादी) ने Section 13(1)(a) के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसमें उसका मुख्य तर्क यह था कि पत्नी ने शादी से लगभग 10 साल पहले से मासिक धर्म न होने के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे.
पति ने बताया कि जांच के दौरान यह पता चला कि पत्नी के गर्भाशय में गंभीर समस्याएँ थीं, जिसके कारण गर्भधारण करना मुश्किल था. पति का आरोप था कि जब इस बारे में पत्नी से पूछा गया, तो उसने स्वीकार किया कि उसने सच्चाई इसलिए छिपाई, क्योंकि अगर वह पहले बताती तो पति उससे शादी नहीं करता. उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी कपड़े, गहने और नकदी लेकर उसे छोड़कर चली गई थी.
पत्नी ने अपने लिखित बयान में सभी आरोपों से इनकार किया था और दावा किया था कि मेडिकल समस्या अस्थायी और इलाज से ठीक होने लायक थी. उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे ससुराल वालों द्वारा "बाँझ महिला" कहकर क्रूरता का शिकार बनाया गया.
हाई कोर्ट ने पति द्वारा प्रस्तुत चिकित्सा दस्तावेजों, जिसमें हिस्टेरोसाल्पिंगोग्राफी (HSG) रिपोर्ट भी शामिल थी, और अन्य मौखिक साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण किया. कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में दवा लेने के बाद बच्चे पैदा करने में सक्षम होने का दावा किया, लेकिन इस संबंध में कोई डॉक्टर प्रमाण पत्र पेश नहीं किया.
फैमिली कोर्ट के निर्णय में कोई अवैधता या अनियमितता न पाते हुए हाई कोर्ट ने तलाक की डिक्री को सही ठहराया. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के हालिया दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने मामले के तथ्यों और पक्षों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर विचार करते हुए पत्नी के पक्ष में Rs. 5,00,000/- का एकमुश्त गुजारा भत्ता तय किया, जिसका भुगतान पति को चार महीने के भीतर करना होगा.