IAS रानू साहू को झटका: गुनाह से पहले की संपत्ति भी जब्त कर सकेगी ED
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की व्याख्या करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसका सीधा असर भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों पर पड़ेगा. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी मामले में अपराध से अर्जित प्रत्यक्ष आय उपलब्ध नहीं है या उसे कहीं और खपा दिया गया है, तो प्रवर्तन निदेशालय (ED) आरोपी की उस संपत्ति को भी कुर्क कर सकता है जो अपराध घटित होने की अवधि से बहुत पहले खरीदी गई थी.
अदालत ने साफ तौर पर कहा कि PMLA की धारा 2(1)(u) के तहत 'अपराध की आय' की परिभाषा में उस संपत्ति का 'समतुल्य मूल्य' भी शामिल है.
इस ऐतिहासिक टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने पूर्व आईएएस अधिकारी रानू साहू और उनके परिजनों द्वारा दायर उन नौ अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें अधिनिर्णायक प्राधिकरण (AA) और अपीलीय न्यायाधिकरण (SAFEMA) द्वारा संपत्ति कुर्की के आदेशों को चुनौती दी गई थी.
यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ के चर्चित कोयला लेवी घोटाले से जुड़ा है, जिसमें सिंडिकेट द्वारा कोयला परिवहन पर 25 रुपये प्रति टन की अवैध वसूली का आरोप है. ईडी का दावा है कि रानू साहू ने कोरबा और रायगढ़ के जिला कलेक्टर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान इस जबरन वसूली में मदद की और बदले में लगभग 5.52 करोड़ रुपये की रिश्वत प्राप्त की. जांच एजेंसी के अनुसार, इन पैसों को परिजनों के माध्यम से अचल संपत्तियों की खरीद में लगाया गया.
ईडी ने रानू साहू की कुल 19 ऐसी संपत्तियों को कुर्क किया था जो कथित अपराध की अवधि (जुलाई 2020) से पहले खरीदी गई थीं. अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि जो संपत्तियां अपराध शुरू होने से पहले ही खरीदी जा चुकी थीं, उन्हें 'अपराध की आय' नहीं माना जा सकता और न ही उनके खिलाफ कोई आपातकालीन कार्रवाई की जानी चाहिए थी.
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को दरकिनार करते हुए कहा कि यदि प्रत्यक्ष रूप से दूषित संपत्तियों की वसूली संभव नहीं है, तो कानून अधिकारियों को उतनी ही कीमत की बेदाग संपत्तियों को कुर्क करने का अधिकार देता है ताकि विधायी उद्देश्य की पूर्ति हो सके.
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि ईडी द्वारा दर्ज किए गए बयान और बरामद डायरी की प्रविष्टियां प्रथम दृष्टया साक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण हैं. अदालत ने कहा कि रानू साहू और उनके परिजन संपत्तियों की खरीद के लिए उपयोग किए गए धन के वैध स्रोत का कोई ठोस स्पष्टीकरण देने में विफल रहे, जिससे यह प्रतीत होता है कि अर्जित संपत्तियां उनकी ज्ञात आय से अधिक थीं.
हाईकोर्ट ने निचली अथॉरिटी के आदेशों को 'सोचा-समझा और तर्कसंगत' बताते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. हालांकि, अदालत ने यह राहत जरूर दी है कि यदि भविष्य में आरोपी मामले में बरी हो जाते हैं, तो वे PMLA की धारा 8(8) के तहत अपनी संपत्ति वापस पाने के लिए कानूनी उपचार की मांग कर सकते हैं.