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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: निजी स्वार्थ के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल गलत

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18 मार्च 2026, 08:24 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आपराधिक न्याय प्रणाली के बढ़ते दुरुपयोग और निहित स्वार्थों के लिए अदालती मशीनरी के इस्तेमाल पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति रजनी दुबे और न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की खंडपीठ ने दुर्ग के एक विशेष न्यायालय द्वारा वर्ष 2017 में दिए गए आरोपियों को बरी करने के आदेश को पूरी तरह सही ठहराते हुए राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है. 


यह मामला लगभग दो दशक पुराने 1999 के एक कथित भूमि धोखाधड़ी कांड से जुड़ा था, जिसमें छत्तीसगढ़ विकास गृह निर्माण सहकारी समिति की जमीन की बिक्री में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए थे.


अदालत ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में यह देखा जा रहा है कि आपराधिक न्याय की मशीनरी का उपयोग कुछ व्यक्तियों द्वारा अपने निजी हितों (Oblique Motives) को पूरा करने के लिए किया जा रहा है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों को ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति निरंतर सतर्क रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समाज के ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली ऐसी कोशिशों को 'शुरुआत में ही कुचल' (Nip in the bud) दिया जाए. 


पीठ ने जोर देकर कहा कि आपराधिक अभियोजन का उपयोग किसी भी व्यक्ति को परेशान करने, निजी प्रतिशोध लेने या आरोपी पर अनुचित दबाव बनाने के उपकरण के रूप में कतई नहीं किया जाना चाहिए.


इस मामले की पृष्ठभूमि 1999 की है, जब विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त) ने एक शिकायत के आधार पर जांच शुरू की थी. आरोप था कि सहकारी गृह निर्माण समिति के अधिकारियों ने एक ठेकेदार और राजस्व निरीक्षकों के साथ मिलकर दुर्ग जिले के पद्मनागर स्थित 6.53 एकड़ जमीन को कई खरीदारों को अवैध रूप से बेच दिया था. 


अभियोजन पक्ष का दावा था कि आरोपियों ने समिति की जमीन को कृषि भूमि बताकर गलत तरीके से पेश किया, जिससे समाज को वित्तीय हानि हुई. इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप पत्र दायर किया गया था.


हालांकि, हाईकोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ कोई भी विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह विफल रहा है. अदालत ने पाया कि Meeting of minds या आपराधिक साजिश का कोई सबूत नहीं था और न ही दस्तावेजों के फर्जीवाड़े का कोई तथ्य सामने आया. 


महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने अभियोजन पक्ष के ही एक गवाह, जो स्टाम्प प्राधिकरण से थे, की गवाही पर भरोसा किया जिन्होंने स्वीकार किया था कि सभी लेनदेन में स्टाम्प शुल्क का आकलन भूमि को कृषि मानकर ही किया गया था. 


इस स्वीकारोक्ति ने अभियोजन की पूरी कहानी की जड़ें हिला दीं. अंततः, न्यायालय ने व्यवस्था दी कि केवल सेल डीड निष्पादित करने से आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती और बिना ठोस सबूतों के किसी प्रशासनिक या नागरिक विवाद को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP