छत्तीसगढ़ HC: अवैध विदेशी नागरिकों पर 'हेबियस कॉर्पस' याचिका मान्य नहीं
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी विदेशी नागरिक को बिना वैध दस्तावेजों के भारत में प्रवेश करने पर सुरक्षात्मक हिरासत में रखा गया है, तो उसे 'अवैध हिरासत' नहीं माना जा सकता. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने बिलासपुर निवासी एक युवक द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को खारिज कर दिया है.
याचिकाकर्ता ने नारी निकेतन में रह रही अपनी बांग्लादेशी पत्नी और मासूम बेटे की रिहाई की मांग की थी.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल तभी लागू होती है जब हिरासत पूरी तरह से गैर-कानूनी हो.
इस मामले में, महिला एक बांग्लादेशी नागरिक है जिसने बिना किसी वैध वीजा या अनुमति के भारत में प्रवेश किया है.
कोर्ट ने माना कि महिला का नारी निकेतन में रहना दंडात्मक नहीं, बल्कि सुरक्षात्मक और वैधानिक है, क्योंकि भारत में उसका कोई कानूनी अभिभावक नहीं है और वर्तमान में उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया विचाराधीन है.
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता और बांग्लादेशी युवती का प्रेम संबंध था, जिसके बाद उन्होंने विवाह कर लिया और बिलासपुर में रहने लगे. युवती के परिवार ने बांग्लादेश में अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसके बाद भारतीय अधिकारियों ने कार्रवाई की.
हालांकि याचिकाकर्ता को आपराधिक आरोपों से बरी कर दिया गया था, लेकिन सरकारी वकील ने तर्क दिया कि महिला की स्थिति एक अवैध विदेशी नागरिक की है.
अदालत ने पूर्व के न्यायिक उदाहरणों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि विदेशी नागरिकता और अनियमित आव्रजन स्थिति के कारण राज्य उसे तब तक हिरासत में रखने के लिए बाध्य है जब तक कि निर्वासन की कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती. कोर्ट ने मां और नवजात शिशु के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए उनकी वर्तमान कस्टडी को पूरी तरह न्यायसंगत ठहराया है.