छत्तीसगढ़ HC: ठोस सबूतों के अभाव में जातिसूचक गाली-गलौज के आरोपी बरी
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने हाल ही में अनुसूचित जनजाति वर्ग की एक महिला शिक्षक द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दो आरोपियों की दोषमुक्ति के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन पक्ष के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास और साक्ष्यों की कमी हो, तो आरोपियों को दोषी करार देना न्यायसंगत नहीं है.
न्यायमूर्ति राधाकृष्ण अग्रवाल की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य विश्वसनीय और ठोस नहीं हैं.
यह पूरा मामला सितंबर 2013 का है, जब पंडरिया क्षेत्र की रहने वाली एक सहायक शिक्षिका ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि काम से लौटते समय दो व्यक्तियों ने उन्हें रास्ते में रोका, उनके साथ बदसलूकी की और जातिगत अपमान करते हुए जान से मारने की धमकी दी.
पुलिस ने इस आधार पर आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर आरोप पत्र दाखिल किया था. हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया था, जिसे अब हाई कोर्ट ने भी कायम रखा है.
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में 'महत्वपूर्ण विसंगतियों' पर विशेष ध्यान दिया. अदालत ने पाया कि महिला द्वारा कोर्ट में दिए गए बयानों और उसकी मूल प्राथमिकी में काफी अंतर था. FIR में इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आरोपियों ने महिला का हाथ पकड़ा या कमर पकड़ी थी, जबकि बाद के बयानों में ये आरोप जोड़े गए.
इसके अलावा, घटना और रिपोर्ट दर्ज कराने के बीच 4 दिनों की देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया.
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि घटना से पहले आरोपियों के परिवार ने महिला के पिता के खिलाफ मारपीट की एक रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसमें आरोपी को गंभीर चोटें आई थीं.
कोर्ट ने माना कि यह मामला आपसी रंजिश से प्रेरित हो सकता है. अंत में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष 'संदेह से परे' आरोपों को साबित करने में विफल रहा है और निचली अदालत का निर्णय पूरी तरह से कानून सम्मत है.