छत्तीसगढ़ HC: अनुसूचित जाति आयोग को सजा सुनाने का अधिकार नहीं
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य अनुसूचित जाति आयोग के पास किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने या सजा सुनाने का अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में दोष साबित करना केवल अदालत का काम है, न कि आयोग का.
जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने कोरबा जिले के शासकीय कॉलेज बरपाली में पदस्थ सहायक प्राध्यापक मृगेश कुमार यादव के खिलाफ आयोग द्वारा दी गई विवादित सिफारिश को रद्द कर दिया है. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आयोग जांच के दौरान केवल तथ्य और दस्तावेज जुटा सकता है और संबंधित प्राधिकारी को कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है.
आयोग खुद जज की भूमिका में आकर किसी के दोषी होने का निर्धारण नहीं कर सकता.
यह मामला सहायक प्राध्यापक मृगेश कुमार यादव से जुड़ा है, जिन पर परीक्षा में नकल के दौरान पकड़े जाने के बाद एक छात्र ने ब्लैकमेल करने और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. पुलिस की शुरुआती जांच में ये आरोप निराधार पाए गए थे.
इसके बावजूद, राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने 16 मार्च 2021 को एक आदेश जारी कर आरोपों को "प्रमाणित" घोषित कर दिया था और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1) के तहत एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की थी. आयोग के इस कदम के खिलाफ यादव ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 'भवानी प्रसाद जेना' और 'मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग' से जुड़े मामलों का हवाला दिया.
अदालत ने साफ किया कि आयोग के पास समन भेजने और साक्ष्य एकत्र करने जैसी सिविल कोर्ट जैसी प्रक्रियात्मक शक्तियां तो हैं, लेकिन पक्षकारों के अधिकारों पर अंतिम फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है.
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में आरोपों को सीधे तौर पर "सिद्ध" बता दिया था, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था. इसलिए हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए आयोग की सिफारिश को पूरी तरह खारिज कर दिया.