ओवरटाइम भत्ते का गैर-भुगतान निरंतर अपराध है: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
ओवरटाइम भत्ते का गैर-भुगतान निरंतर अपराध है: छत्तीसगढ़ हाईकोर्टओवरटाइम भत्ते का गैर-भुगतान निरंतर अपराध है: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि रेलवे कर्मचारियों को ओवरटाइम भत्ता न देने को निरंतर अपराध माना जाएगा, जो प्रत्येक नकार से नया कारण बन जाता है. इस कारण देरी या लापरवाही का हवाला देकर दावा खारिज नहीं किया जा सकता. जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह फैसला देकर सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के आदेश को बरकरार रखा है.
यह मामला साउथ ईस्ट सेंट्रल रेलवे, बिलासपुर जोन के इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत रेलवे कर्मचारियों से जुड़ा है. ये कर्मचारी 2007 से 2010 के बीच ओवरटाइम ड्यूटी करते थे. सेवानिवृत्ति के बाद (2010 से 2015 के बीच) उन्होंने ओवरटाइम भत्ते का दावा किया. रेलवे के पर्सनल ब्रांच ने 19 कर्मचारियों के दावों की जांच की और कुल बकाया राशि 40,22,837 रुपये आंकी. हालांकि, सीनियर डिविजनल पर्सनल ऑफिसर ने इसे पुराना और विलंबित बताकर खारिज कर दिया.
नाराज कर्मचारियों ने 2017 में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में मूल आवेदन दायर किए. सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने इनके स्वीकार करते हुए कहा कि ओवरटाइम भत्ता न देने से निरंतर गलती होती है, इसलिए देरी का कोई मुद्दा नहीं. सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने रेलवे को 60 दिनों में भुगतान का निर्देश दिया. यूनियन ऑफ इंडिया ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ रिव्यू आवेदन दायर किया, जो 7 दिसंबर 2020 को खारिज हो गया.
हाईकोर्ट में चुनौती
यूनियन ऑफ इंडिया और रेलवे अधिकारियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसमें दावा किया गया कि सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने गलत तरीके से भत्ता देने का आदेश दिया. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि दावा 4 मार्च 2015 को विभाग द्वारा खारिज हो चुका था, इसलिए यह विलंबित है. साथ ही, रेलवे सर्वेंट्स (वर्किंग आवर्स एंड पीरियड ऑफ रेस्ट) रूल्स, 2005 की धारा 7(3) के तहत कर्मचारी भत्ते के हकदार नहीं हैं.
दूसरी ओर, कर्मचारियों ने कहा कि देरी का सवाल ही पैदा नहीं होता. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तरसेम सिंह' का हवाला दिया, जिसमें ओवरटाइम भत्ता न देने को रेलवे की ओर से निरंतर गलती बताया गया है.
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे अधिकारियों ने खुद कर्मचारियों के दावों की जांच की और 19 कर्मचारियों के लिए 40,22,837 रुपये की राशि निर्धारित की. खारिजगी का आधार केवल पुराना होना था. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले का सहारा लिया, जिसमें कहा गया है कि यदि शिकायत निरंतर गलती से जुड़ी है, तो लंबी देरी के बावजूद राहत दी जा सकती है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ओवरटाइम जैसे भत्ते का गैर-भुगतान निरंतर अपराध है. रेलवे सर्वेंट्स रूल्स की धारा 7(3) का तर्क भी लागू नहीं होता, क्योंकि मूल खारिजगी आदेश केवल देरी पर आधारित था. अदालत ने कहा कि रेलवे खुद भुगतान न करने के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए पुराने दावे को खारिज करना उचित नहीं.
नतीजतन, कोर्ट ने रिट याचिकाओं में कोई दम नहीं पाया. सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के आदेशों को बरकरार रखा गया और रेलवे को निर्देश दिया गया कि 45 दिनों के भीतर कर्मचारियों के दावों पर कार्रवाई कर ओवरटाइम भत्ता भुगतान करें. इस फैसले से रेलवे कर्मचारियों के पुराने दावों को नई राह मिली है.