हसदेव अरण्य: कॉर्पोरेट कोयले के खिलाफ जंग
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य, जिसे लोग "मध्य भारत के फेफड़े" कहते हैं, जैव-विविधता और सांस्कृतिक धरोहर का खजाना है. लेकिन अब ये इलाका गंभीर खतरे में है.
7 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ वन विभाग ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को दी गई केंटे एक्सटेंशन कोयला खदान के लिए 1,742.6 हेक्टेयर घने जंगल की जमीन को हस्तांतरित करने की सिफारिश की. इस प्रोजेक्ट में अडानी एंटरप्राइजेज खनन का काम कर रही है. ये फैसला केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया, जिसके बाद आदिवासी समुदायों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने इसका जमकर विरोध शुरू कर दिया.
26 जून 2025 को सरगुजा डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर के निरीक्षण के आधार पर ये सिफारिश की गई. लेकिन इस पर ग्राम सभाओं के अधिकारों को कुचलने, पर्यावरण नियमों की अनदेखी और लाखों आदिवासियों की आजीविका को कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए दांव पर लगाने का आरोप लग रहा है. अब ये प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार कर रहा है. हसदेव का ये संघर्ष विकास, आदिवासी अधिकारों और भारत की पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच टकराव की बड़ी मिसाल बन गया है.
जंगल के रखवालों की आवाज दबाने की कोशिश
हसदेव के जंगलों को कोयला खनन के लिए खाली करने का वन विभाग का फैसला पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) का खुला उल्लंघन है. ये कानून भारत के पांचवीं अनुसूची वाले इलाकों में आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार देता है. इसमें विकास परियोजनाओं को मंजूरी देना या रोकना, जंगलों का प्रबंधन और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना शामिल है. वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 भी आदिवासियों को जंगलों को संभालने और उन्हें नुकसानदायक परियोजनाओं से बचाने का हक देता है.
लेकिन हसदेव में केंटे एक्सटेंशन कोयला ब्लॉक के लिए वन विभाग की सिफारिश इन कानूनों को रौंदने का आरोप है. छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने पास की परसा कोयला खदान की मंजूरी में गड़बड़ियों का खुलासा किया था, जिसमें ग्राम सभा की सहमति में जालसाजी और आदिवासी नेताओं पर दबाव बनाने की बात सामने आई थी. केंटे एक्सटेंशन के मामले में भी यही शिकायतें हैं. कार्यकर्ताओं का कहना है कि वन विभाग ने सलही, हरिहरपुर और फतेहपुर जैसे गांवों में ग्राम सभाओं से जरूरी सलाह-मशविरा तक नहीं किया.
वन विभाग का दावा है कि ये कदम वर्किंग प्लान कोड 2023 के तहत "वैज्ञानिक वन प्रबंधन" के लिए जरूरी है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये PESA और FRA जैसे कानूनों को नजरअंदाज करने का बहाना है. ये कानून आदिवासियों को उनके जंगलों की रक्षा का अधिकार देते हैं. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने वन विभाग की इस कार्रवाई की निंदा की है. उनका कहना है, "ये सिफारिश PESA और FRA का उल्लंघन करती है. ये उन आदिवासी समुदायों की आवाज दबाती है, जो पीढ़ियों से हसदेव के रखवाले रहे हैं."
किसका जंगल, किसका भविष्य?
वन विभाग का ये कदम एक बड़ा सवाल उठाता है: आखिर ये जंगल किसके लिए हैं? कॉर्पोरेट्स के लिए या उन आदिवासियों के लिए, जिनका पूरा जीवन हसदेव पर टिका है? केंटे एक्सटेंशन कोयला ब्लॉक हसदेव अरण्य कोयला क्षेत्र का हिस्सा है, जो 1,879.6 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसमें 5.179 बिलियन टन कोयले का भंडार है. इस प्रोजेक्ट में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के साथ अडानी एंटरप्राइजेज काम कर रही है. ये 1,742 हेक्टेयर घने जंगल को निशाना बना रहा है, जो चोरनाई नदी के जलग्रहण क्षेत्र में है और जल सुरक्षा व जैव-विविधता के लिए बेहद जरूरी है.
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बीजेपी की राज्य सरकार पर पर्यावरणीय वादों को तोड़ने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, "बीजेपी का 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान तब हास्यास्पद लगता है, जब वो कॉर्पोरेट हितों के लिए 6 लाख पेड़ काटने की योजना बनाती है." बघेल का कहना है कि हसदेव में पहले से चल रही परसा ईस्ट और केंटे बेसन (PEKB) खदान में 350 मिलियन टन कोयला है, जो राजस्थान की बिजली जरूरतों को 20 साल तक पूरा कर सकता है. ऐसे में केंटे एक्सटेंशन प्रोजेक्ट की जरूरत ही नहीं है. इससे साफ है कि ये फैसला कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए लिया जा रहा है, न कि जनता की जरूरत के लिए.
हसदेव का पर्यावरणीय महत्व भी कम नहीं है. ये जंगल 640 पौधों की प्रजातियों, 128 औषधीय पौधों, 92 पक्षी प्रजातियों और हाथी, भालू, तेंदुआ जैसे लुप्तप्राय जानवरों का ठिकाना है. वन्यजीव संस्थान (WII) ने चेतावनी दी है कि हसदेव में खनन से मानव-हाथी टकराव बढ़ेगा और वन्यजीवों के लिए जरूरी गलियारे टूट जाएंगे. भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (ICFRE) ने बताया कि हसदेव नदी और हसदेव बांगो बांध के जरिए ये जंगल 3 लाख हेक्टेयर खेतों की सिंचाई में अहम भूमिका निभाता है.
भारत की पर्यावरणीय और आदिवासी प्रतिबद्धताएं दांव पर
हसदेव का विवाद भारत के सामने एक बड़ी चुनौती पेश करता है. जैव-विविधता संधि (CBD) के तहत भारत को हसदेव जैसे संवेदनशील इलाकों की रक्षा और संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल की जिम्मेदारी है. पेरिस समझौते में भारत ने कार्बन उत्सर्जन कम करने और वृक्षारोपण से 2.5-3 बिलियन टन कार्बन सिंक बनाने का वादा किया है. लेकिन हसदेव में जंगलों की प्रस्तावित कटाई इन लक्ष्यों के खिलाफ है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को बढ़ाएगी.
हसदेव की आत्मा के लिए जंग
17 अक्टूबर 2024 को सलही, हरिहरपुर और फतेहपुर जैसे गांवों में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए. पुलिस की लाठीचार्ज और हिरासत की खबरें सामने आईं. हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने वन मंजूरी को तुरंत रद्द करने और जालसाजी व दबाव बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.
हसदेव को 2009 में "नो-गो" क्षेत्र घोषित किया गया था, लेकिन बाद में इस फैसले को पलट दिया गया. ये बार-बार कोयला खनन को पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण पर तरजीह देने का पैटर्न दिखाता है.
आगे क्या?
केंटे एक्सटेंशन की सिफारिश अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार कर रही है. हसदेव का ये संघर्ष भारत के पर्यावरणीय और सामाजिक न्याय के लिए एक अहम मोड़ है. क्या सरकार PESA और FRA जैसे कानूनों को बनाए रखेगी, जो आदिवासियों को उनके जंगलों पर अधिकार देते हैं? या फिर कॉर्पोरेट हित जीतेंगे, और जैव-विविधता से भरा ये पारिस्थितिकी तंत्र और लाखों लोगों की आजीविका कोयले की भेंट चढ़ जाएगी?