हसदेव में पेड़ कहां लगाये जा रहे हैं?-सुप्रीम कोर्ट
"पेड़ कहां लगाये जा रहे हैं?" सुप्रीम कोर्ट ने पूछा
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में कोयला खनन को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कोयला ब्लॉक आवंटियों और राज्य सरकार से पूछा कि प्रतिपूरक उपायों के तहत पेड़ कहां लगाये जा रहे हैं.
जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई की. पहली याचिका छत्तीसगढ़ के वकील और कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव ने दायर की थी, जिसमें परसा ईस्ट और केते बसन तथा परसा कोयला ब्लॉक के लिये दी गई गैर-वन उपयोग और खनन अनुमतियों को रद्द करने की मांग की गई थी.
दूसरी याचिका दिनेश कुमार सोनी ने दायर की थी, जो कोलगेट मामले से संबंधित है. कोलगेट मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने 1993-2009 के बीच हुए कोयला आवंटन को अवैध घोषित किया था.
कोर्ट में बहस: हसदेव के जंगलों का मुद्दा
याचिकाकर्ता दिनेश कुमार सोनी की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि हसदेव अरण्य वन क्षेत्र को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 'नो-गो' और अछूता क्षेत्र घोषित किया है. उन्होंने कहा कि देश के केवल 10% कोयला भंडार इन क्षेत्रों में हैं, फिर भी खनन की अनुमति दी गई है, जिससे बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही है.
भूषण ने कोलगेट मामले का हवाला देते हुये कहा कि उसी एजेंसी को कोयला ब्लॉक आवंटित किये गये, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने पहले रद्द कर दिया था, और अब यह फिर से अडानी समूह को सौंपा गया है, जो कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है.
प्रतिवादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि खनन के लिए चरणबद्ध तरीके से पेड़ काटने की अनुमति है. उन्होंने तर्क दिया कि यदि 100 पेड़ काटे जाते हैं, तो 1,000 पेड़ लगाने का प्रावधान है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहता है. उनके मुताबिक, सभी जरूरी अनुमतियां ली गई हैं.
इस पर जस्टिस कांत ने सवाल उठाया, "100 पेड़ काटने के बदले 1,000 पेड़ कहाँ लगाये जा रहे हैं? कौन सी जगह पर? कौन रोपण कर रहा है? क्या कोई सरकारी एजेंसी इसकी निगरानी कर रही है?"
रोहतगी ने जवाब दिया कि रोपण का काम प्रतिवादी करते हैं, जबकि निगरानी छत्तीसगढ़ के वन विभाग की जिम्मेदारी है. जस्टिस कांत ने टिप्पणी की कि यह कहना आसान है कि 1,000 पेड़ लगाये जायेंगे, लेकिन सवाल यह है कि वे पेड़ छत्तीसगढ़ के उसी जिले में लगाए जा रहे हैं या किसी अन्य राज्य में.
याचिकाकर्ता का पक्ष: वन्यजीवों पर खतरा
सुदीप श्रीवास्तव ने स्वयं कोर्ट में तर्क रखते हुए कहा कि प्रतिवादी वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का उल्लंघन करते हुए दूसरा और तीसरा कोयला ब्लॉक खोल रहे हैं.
उन्होंने बताया कि देश के कुल कोयला भंडार का केवल 10% घने जंगलों में है, और वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, इन जंगलों को छुये बिना कोयले की मांग पूरी की जा सकती है. श्रीवास्तव ने कहा कि पहले कोयला ब्लॉक में 3.68 लाख पेड़ हैं, और दूसरे में 96,000 पेड़ हैं.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पहला ब्लॉक ही प्रतिवादियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है, फिर भी वे 98% घने जंगल वाले क्षेत्रों में खनन कर रहे हैं.
प्रतिवादी वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का हवाला देते हुए श्रीवास्तव ने बताया कि खनन से हसदेव क्षेत्र को अपूरणीय क्षति होगी. उन्होंने यह भी कहा कि यह क्षेत्र मानव-हाथी संघर्ष का केंद्र है, और देश में मानव-हाथी संघर्ष के कारण होने वाली 15% मौतें छत्तीसगढ़ में होती हैं.
राज्य सरकार और केंद्र का पक्ष
छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि राज्य वनीकरण के लिए कदम उठा रहा है. जस्टिस कांत ने उनसे पूछा कि क्या उनके पास वन क्षेत्र का हवाई दृश्य उपलब्ध है? पहले चरण में कितने पेड़ काटे गये, और वैकल्पिक रोपण कहाँ हुआ है? इसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि छत्तीसगढ़ की पूरी विधानसभा ने कोयला खनन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था. वहीं, परसा केते कोलियरीज लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि उनकी कंपनी केवल माइन डेवलपर और ऑपरेटर है, और इसका कोई अन्य रोल नहीं है.
प्रशांत भूषण ने तत्काल सुनवाई की मांग की, क्योंकि मानसून के बाद पेड़ों की कटाई फिर से शुरू हो सकती है. कोर्ट ने सभी पक्षों को सुविधा संकलन और जवाब दाखिल करने का समय देते हुए मामले को 19 अगस्त के लिए स्थगित कर दिया.