बस्तर दशहराः ग्रामीणों की नाराजगी के बीच शुरू हुई फूल रथ परिक्रमा
जगदलपुर | संवाददाताः बस्तर दशहरे की विश्व प्रसिद्ध रस्म रथ परिक्रमा को लेकर बुधवार की रात प्रशासन और ग्रामीणों के बीच जमकर विवाद हुआ. ग्रामीणों ने रथ खींचने से मना कर दिया था. ग्रामीण 600 साल पुरानी परंपरा को जीवित करने के लिए देर रात तक प्रशासन के सामने अड़े रहे.
ग्रामीणों का कहना था कि इस बार बस्तर के राज परिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव और उनकी पत्नी को मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ रथ पर बिठाया जाए. इसी वजह से फूल रथ परिक्रमा में देरी हुई. देर रात को कमलचंद भंजदेव की समझाइश के बाद ग्रामीण माने और रथ की परिक्रमा करवाई गई. बस्तर दशहरा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि परिक्रमा देरी से हुई.
बस्तर दशहरे में आदिवासियों द्वारा हाथों से ही पारंपरिक औजारों द्वारा बनाए गए विशालकाय रथ की शहर परिक्रमा कराई जाती है. करीब 40 फीट ऊंचे व कई टन वजनी इस रथ को परिक्रमा के लिए खींचने सैकड़ों आदिवासी स्वेच्छा से पहुंचते हैं. परिक्रमा के दौरान रथ पर मां दंतेश्वरी के छत्र को विराजमान कराया जाता है.
बस्तर दशहरे की इस अद्भुत रस्म कि शुरुआत 1410 में तात्कालिक महाराजा पुरषोत्तम देव के द्वारा की गई थी. महाराजा पुरषोत्तम ने जगन्नाथपुरी जाकर रथपति की उपाधि प्राप्त की थी. जिसके बाद से अब तक यह परम्परा अनवरत इसी तरह चले आ रही है. दशहरे के दौरान देश में इकलौती इस तरह की परंपरा को देखने हर वर्ष हजारों की संख्या में लोग बस्तर पहुंचते हैं.
हालांकि इस बार रथ खींचने वाले सैकड़ों ग्रामीण और बस्तर पटेल समाज 600 साल पुरानी परंपरा को जीवित करने के लिए देर रात तक प्रशासन के सामने अड़े रहे. ग्रामीणों की प्रशासन से मांग थी कि इस बार बस्तर के राज परिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव और उसकी पत्नी को मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ रथ पर बिठाया जाए.
देर रात तक भारी बारिश के बीच इस पर विवाद चलता रहा. इसके बाद खुद राजपरिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव ने ग्रामीणों को समझाया. कमलचंद भंजदेव ने कहा कि माई जी के सम्मान में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. इसलिए आप रथ की परिक्रमा करवाइए. वहीं ग्रामीण कहते रहे जब तक आप नहीं बैठेंगे रथ को नहीं खींचेंगे.
काफी देर बाद किलेपाल इलाके के ग्रामीणों ने रथ को खींचा और बिना उनके सवार हुए रथ परिक्रमा की परंपरा निभाई गई.
सदियों पुरानी है रथ परिक्रमा की परंपरा
नवरात्रि के दूसरे दिन से सप्तमी तक मांई जी की सवारी को परिक्रमा लगवाने वाले इस रथ को फूल रथ के नाम से जाना जाता है.
मां दंतेश्वरी के मंदिर से मांईजी के छत्र व मुकुट को डोली में रथ तक लाया जाता है.
इसके बाद बस्तर पुलिस के महिला सैनिकों के द्वारा सलामी देकर इस रथ की परिक्रमा का आगाज किया जाता है.
बस्तर में दशहरा पर्व की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है.
पुरानी परंपरा को दोबारा शुरू करने अड़े ग्रामीण
इस बार राज परिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और उनकी पत्नी को रथ में सवार होने की मांग को लेकर पटेल समाज के अध्यक्ष रतराम कश्यप ने कहा कि अब तक बस्तर राजकुमार कमलचंद भंजदेव अविवाहित रहते हुए, बिना रथ में सवार हुए परंपरा निभाते रहे. लेकिन उनके विवाह के बाद समाज चाहता है कि रथ पर राजा और रानी दोनों एक साथ सवार हों.
इस मांग को लेकर समाज ने पहले ही चेतावनी दी थी कि यदि यह मांग पूरी नहीं हुई तो समाज के लोग और रथ खींचने वाले ग्रामीण रथ के सामने धरना देकर परिक्रमा को रोक देंगे.
इस विवाद पर जगदलपुर तहसीलदार राहुल गुप्ता ने कहा कि यह मुद्दा पहले भी सामने आया था और इसे शासन तक भेजा जा चुका है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्णय प्रशासनिक स्तर पर नहीं लिया जा सकता. शासन से जो भी निर्देश आएंगे उनका पालन होगा.
राजा ने मनाया प्रजा को
गौरतलब है कि 1966 में बस्तर राजा प्रवीण चंद्रभान देव की मृत्यु के बाद से अब तक रथ पर केवल मंदिर के पुजारी माताजी का छत्र लेकर सवार होते रहे हैं.
करीब 59 साल बाद, राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के विवाह के बाद पटेल समाज अब इस परंपरा को फिर से शुरू करने की मांग पर अड़ा रहा.
कमलचंद भंजदेव ने नाराज हुए पटेल समाज के लोगों और ग्रामीणों को काफी देर तक मनाया लेकिन ग्रामीण अपनी मांग को लेकर अड़े रहे.
काफी मान-मनौवल के बाद आखिरकार ग्रामीण बिना राजा के रथ की परिक्रमा के लिए राजी हुए. आधी रात को रथ परिक्रमा की रस्म पूरी की गई.