अनिल टुटेजा की NAN घोटाला में अग्रिम जमानत याचिका HC से खारिज
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के एक मामले में राज्य के पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा को बड़ा झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट से डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) घोटाले में जमानत मिलने के महज कुछ ही दिनों बाद, हाई कोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज मामले में टुटेजा की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने सख्त टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि लोक सेवकों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार समाज की प्रगति की इच्छाशक्ति को नष्ट कर देता है. एक भ्रष्टाचार मुक्त समाज सुनिश्चित करने के लिए यदि आवश्यक हो, तो अदालतों को आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को रोकने में संकोच नहीं करना चाहिए.
लोकतंत्र और सुशासन के लिए बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार: हाई कोर्ट
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 15 मई को दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा दुश्मन है. यह न केवल सुशासन को प्रभावित करता है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और कानून के शासन की नींव को भी कमजोर करता है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक पद के दुरुपयोग और आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों को बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए, क्योंकि ये देश के वित्तीय स्वास्थ्य और संस्थागत भरोसे को चोट पहुंचाते हैं.
क्या है पूरा मामला और NAN घोटाला?
यह मामला मूल रूप से साल 2015 के बहुचर्चित नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) घोटाले और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच से जुड़ा हुआ है. 2015 में छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, जहां घटिया चावल की आपूर्ति के बदले अधिकारियों को रिश्वत देने की बात सामने आई थी.
शुरुआती चार्जशीट में अनिल टुटेजा का नाम नहीं था, लेकिन दिसंबर 2018 की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में उन्हें आरोपी बनाया गया. इसके बाद 2019 में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया. वर्तमान सीबीआई मामला फरवरी 2020 में आयकर छापों के दौरान बरामद हुए व्हाट्सएप चैट पर आधारित है, जिसे सीबीआई ने 16 अप्रैल 2025 को दोबारा दर्ज किया था.
सीबीआई का आरोप: आधिकारिक पद का हुआ दुरुपयोग
सीबीआई का आरोप है कि अनिल टुटेजा, सह-आरोपी आलोक शुक्ला और पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने मिलकर नन (NAN) घोटाले और ईडी की जांच से जुड़ी कानूनी कार्यवाही को प्रभावित करने की साजिश रची. जांच एजेंसी के अनुसार, इन अधिकारियों ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर विभागीय रिकॉर्ड में हेरफेर किया, गवाहों को प्रभावित किया और अदालत के समक्ष पेश किए जाने वाले आधिकारिक जवाबों को बदला.
सीबीआई ने दलील दी कि मामला अभी बेहद संवेदनशील मोड़ पर है और टुटेजा के प्रशासनिक प्रभाव को देखते हुए उन्हें अग्रिम जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है.
बचाव पक्ष का तर्क: राजनीतिक प्रतिशोध और साक्ष्यों पर सवाल
अनिल टुटेजा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया. बचाव पक्ष ने दलील दी कि टुटेजा को लगातार और ओवरलैपिंग मामलों में गिरफ्तार कर जेल में रखने की कोशिश की जा रही है. इसके अलावा, उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (व्हाट्सएप चैट) की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए.
वकीलों का कहना था कि साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी 'हैश वैल्यू' और साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के नियमों का पालन नहीं किया गया है, इसलिए केवल चैट के आधार पर किसी को स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता.
कोर्ट का रुख: ट्रायल के दौरान होगी सबूतों की जांच
हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि व्हाट्सएप चैट से छेड़छाड़ या प्रक्रियात्मक खामियों जैसे तकनीकी और तथ्यात्मक मुद्दों की जांच ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही की जा सकती है, अग्रिम जमानत के चरण में नहीं. कोर्ट ने टुटेजा की तुलना सह-आरोपी सतीश चंद्र वर्मा से करने से भी इनकार कर दिया और कहा कि पूर्व आईएएस अधिकारी पर लगे आरोप अलग स्तर के हैं.
DMF घोटाले में सुप्रीम कोर्ट से मिल चुकी है राहत
गौरतलब है कि इससे पहले 18 मई को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने अनिल टुटेजा को डीएमएफ (DMF) घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में नियमित जमानत दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि टुटेजा अप्रैल 2024 से हिरासत में हैं (और फरवरी 2026 में इस मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार हुए थे) और ट्रायल जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है, इसलिए उन्हें और अधिक समय तक जेल में रखना उचित नहीं है.
हालांकि, हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब टुटेजा की मुश्किलें सीबीआई वाले मामले में फिर बढ़ गई हैं.