क्रिमिनल केस पेंडिंग होने मात्र से नौकरी रोकना सही नहीं- हाईकोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पुलिस विभाग में आरक्षक पद पर नियुक्ति से जुड़े एक बेहद अहम मामले में बड़ी व्यवस्था दी है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक किसी उम्मीदवार पर आरोप सिद्ध न हो जाएं, केवल मुकदमा लंबित होने के आधार पर उसकी उम्मीदवारी निरस्त करना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है.
न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता के दस्तावेजों का पुनर्मूल्यांकन कर दो महीने (60 दिन) के भीतर एक कारण दर्शाते हुए तार्किक आदेश पारित करें. अदालत के इस रुख से भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की उम्मीद जगी है.
यह पूरा प्रकरण जांजगीर-चांपा के धनगांव निवासी नरेंद्र पाल बर्मन से संबंधित है. वर्ष 2024 की शुरुआत में जारी पुलिस आरक्षक भर्ती में याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति वर्ग के तहत बलौदाबाजार-भाटापारा जिले से भाग लिया था. शारीरिक दक्षता और लिखित परीक्षा पास करने के बाद उनका नाम वेटिंग लिस्ट में शीर्ष पर आया था.
हालांकि, चिकित्सीय जांच और चरित्र सत्यापन के दौरान अदालत में एक मामला विचाराधीन होने के कारण विभाग ने नियुक्ति की प्रक्रिया को रोक दिया.
अधिवक्ता नरेंद्र मेहर, वरिष्ठ वकील मतीन सिद्दीकी और जैनब मुस्तफा वनक के माध्यम से दायर याचिका में कोर्ट को बताया गया कि अभ्यर्थी ने सत्यापन फॉर्म भरते समय अपने खिलाफ लंबित मुकदमे की जानकारी खुद दी थी, जो उसकी ईमानदारी को दर्शाता है.
वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के 'अवतार सिंह बनाम केंद्र सरकार' और 'अजहर मेहर बनाम भारत संघ' के नज़ीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिना दोषसिद्धि के किसी अभ्यर्थी को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए विभाग को आपराधिक कृत्य की प्रकृति का अध्ययन कर नियमानुसार फैसला लेने का समय प्रदान किया है.