पुराने चिकित्सा उपकरणों के आयात को मंजूरी क्यों?
जब देश में ही बनते हैं तो विदेशी पुराने चिकित्सा उपकरणों के आयात को मंजूरी क्यों?
सीजीखबर डेस्क: भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा हाल ही में पुराने और नवीनीकृत (रिफर्बिश्ड) चिकित्सा उपकरणों के आयात को दी गई मंजूरी ने देश के 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. एक ओर सरकार देश में उच्च तकनीक वाले उपकरणों के निर्माण के लिए करोड़ों का निवेश कर रही है, वहीं दूसरी ओर पुराने एमआरआई (MRI), सीटी स्कैन (CT Scan) और रोबोटिक सर्जरी सिस्टम जैसे कबाड़ हो चुके विदेशी उपकरणों के लिए दरवाजे खोलना विशेषज्ञों को तर्कहीन लग रहा है.
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMeD) और देश के तमाम घरेलू निर्माताओं का कहना है कि यह फैसला न केवल स्थानीय उद्योगों की कमर तोड़ देगा, बल्कि भारत को विकसित देशों के 'ई-कचरे' का डंपिंग ग्राउंड बना देगा. चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने जनवरी 2025 में ही इन उपकरणों के आयात को अवैध बताया था, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय के हालिया फैसले ने एक बड़ा नीतिगत विरोधाभास पैदा कर दिया है.
यह विवाद इसलिए भी गहरा गया है क्योंकि पिछले एक दशक में भारतीय कंपनियों ने चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है. आज भारत न केवल साधारण उपकरण बना रहा है, बल्कि जटिल और उच्च तकनीक वाली मशीनें भी तैयार कर रहा है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरती हैं. भारत में वर्तमान में कई महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है, जिनमें प्रमुख हैं:
कार्डियोवस्कुलर उपकरण: हार्ट वाल्व (Heart Valve), कोरोनरी स्टेंट (Stents) और पेसमेकर.
डायग्नोस्टिक इमेजिंग: भारत अब खुद के सीटी स्कैन, एमआरआई कॉइल्स, एक्स-रे मशीनें और अल्ट्रासाउंड सिस्टम बना रहा है.
सर्जिकल और आईसीयू उपकरण: वेंटिलेटर, डायलाइजर मशीनें, एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, और आधुनिक इलेक्ट्रोसर्जिकल यूनिट्स.
ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट्स: कृत्रिम जोड़ (Knee & Hip Implants) और अस्थि स्थिरीकरण उपकरण.
कैंसर केयर: लीनियर एक्सेलेरेटर (LINAC) जैसे कैंसर के इलाज में काम आने वाले उच्च स्तरीय उपकरण.
अन्य डिस्पोजेबल: सीरिंज, कैथेटर, और हाई-टेक डायग्नोस्टिक किट्स.
घरेलू उद्योग का तर्क है कि जब भारत इन जटिल तकनीकों को खुद विकसित कर चुका है, तो विदेशों से छोड़े गए पुराने उपकरणों को लाकर मरीजों की जान जोखिम में डालना और स्थानीय निवेश को हतोत्साहित करना समझ से परे है. दिल्ली उच्च न्यायालय में इस मामले पर याचिका भी दायर की जा चुकी है क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने उपकरणों की सटीकता और स्वच्छता (Patient Safety) हमेशा संदेह के घेरे में रहती है. अब सबकी निगाहें स्वास्थ्य मंत्रालय पर टिकी हैं कि क्या वह घरेलू निर्माताओं के हितों की रक्षा के लिए इस फैसले पर हस्तक्षेप करेगा.