संसद पर डेमोक्रेट्स के कब्ज़े का भारत-अमेरिका ट्रेड-डील पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिकी संसद पर डेमोक्रेट्स के कब्ज़े के बीच भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार सौदे को लेकर विशेषज्ञों ने नई संभावनाएं और चुनौतियां जताई हैं. जहां राष्ट्रपति ट्रंप घरेलू स्तर पर बढ़त दिखाने के लिए भारत पर कार्यकारी शक्तियों और टैरिफ के ज़रिए त्वरित समझौते का दबाव बना सकते हैं, वहीं भारतीय वार्ताकार इसे अधिक अनुकूल सौदा हासिल करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं.
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका में हुए हालिया मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने भारत और अमेरिका के बीच जारी व्यापार वार्ता के समीकरण बदल दिए हैं. चुनावों में डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों—सेनेटर और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स—पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया है. विशेषज्ञों के अनुसार, इस नए राजनीतिक परिदृश्य के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत में तेज़ी आने की संभावना है, लेकिन सौदा अंतिम रूप लेने तक भारत पर नए और उच्च टैरिफ का खतरा भी मंडरा सकता है.
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, रूस, चीन और ईरान के खिलाफ विदेश नीति का प्रभाव कम होने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को घरेलू मोर्चे पर अपनी ताकत साबित करने के लिए एक त्वरित जीत की आवश्यकता है. ऐसे में वे अपनी कार्यकारी शक्तियों (Executive Powers) का प्रयोग करते हुए भारत पर अमेरिकी कृषि और औद्योगिक उत्पादों को भारतीय बाजार में पहुंच दिलाने तथा अन्य प्रमुख रियायतें देने का दबाव बढ़ा सकते हैं.
हालांकि, पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के नेताओं ने संकेत दिए हैं कि व्यापार समझौता लगभग तैयार है और अंतिम मंजूरी का इंतजार कर रहा है, जबकि भारत अपने प्रतिस्पर्धियों पर स्पष्ट बढ़त का आश्वासन मिलने तक रुकने का रुख अपनाए हुए है.
दूसरी ओर, नीतिगत थिंक-टैंक कोएन एडवाइजरी ग्रुप के निदेशक दीप पाल का मानना है कि इन चुनाव परिणामों से ट्रंप प्रशासन को अपनी नीतियों के लिए समर्थन जुटाने में कठिनाई हो सकती है, क्योंकि उन्हें अब हर फैसला अपनी कोर रिपब्लिकन वोट बैंक को 'घरेलू जीत' के रूप में दिखाना होगा.
हालांकि, भारतीय वार्ताकार इस नई स्थिति को अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण से देख सकते हैं. भारतीय पक्ष का मानना है कि बदला हुआ राजनीतिक माहौल ट्रंप प्रशासन को वर्तमान गतिरोध खत्म कर भारत के पक्ष में एक बेहतर और अनुकूल सौदा करने के लिए प्रेरित कर सकता है.
व्यापार सौदे की खींचतान के बीच भारत पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ने की आशंका बनी हुई है. वर्ष 2026 के 'लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' जैसे कानूनों को अमेरिकी संसद में दोनों प्रमुख दलों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स) का कड़ा समर्थन हासिल हुआ है. इसके तहत भारतीय तेल एवं गैस आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है.
यद्यपि राष्ट्रपति ने फिलहाल राष्ट्रीय हित में इसके क्रियान्वयन पर रोक लगा रखी है, लेकिन यदि वे इसे लागू करते हैं तो डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली संसद से भी कोई विरोध नहीं मिलेगा.
इसके अतिरिक्त, अमेरिका 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 (Section 301) के तहत यह जांच कर रहा है कि क्या भारत अपनी अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता के ज़रिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहा है. इस जांच के आधार पर राष्ट्रपति बिना संसद की अनुमति के अतिरिक्त शुल्क लगा सकते हैं.
इससे पहले भी बंधुआ मजदूरी से जुड़े सामान के आयात को लेकर धारा 301 के तहत 10% का शुल्क और 1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 (Section 232) के तहत इस्पात और एल्युमीनियम पर 50% का टैरिफ लगाया जा चुका है, जिसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा है और जिसे डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली संसद भी रद्द नहीं कर सकती.