क्या ट्रंप और नेतन्याहू के 'सुपर अलायंस' को ले डूबा ईरान युद्ध?
डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी और बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को चुनावों में मिली बड़ी हार ने वाशिंगटन और तेल अवीव के संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान और अमेरिकी सैन्य सहायता पर उठते सवालों के बीच दोनों नेताओं का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बिगड़ता नजर आ रहा है.
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक साझेदारी को दोनों देशों के मतदाताओं ने एक साथ खारिज कर दिया है. मंगलवार को हुए अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने संसद के दोनों सदनों- प्रतिनिधि सभा और सीनेट से अपना नियंत्रण खो दिया है.
वहीं, दूसरी तरफ इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनावों में नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन 61 सीटों के बहुमत के आंकड़े से पिछड़कर महज 53 सीटों पर सिमट गया. दोनों देशों में आए इस ऐतिहासिक राजनीतिक भूचाल के बाद वाशिंगटन और तेल अवीव के भावी संबंधों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
ईरान युद्ध और मतदाता आक्रोश का असर
इस करारी हार के पीछे दोनों देशों का संयुक्त सैन्य अभियान और विदेश नीति मुख्य वजह बनकर उभरी है. फरवरी के अंत में ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, जिसके बाद क्षेत्रीय युद्ध का खतरा पैदा हो गया.
मैरीलैंड विश्वविद्यालय के 'क्रिटिकल इश्यूज पोल' के निदेशक शिब्ली तेलहामी के सर्वेक्षण के अनुसार, अधिकांश अमेरिकी मतदाताओं का मानना था कि इजराइल ने ट्रंप प्रशासन को इस खर्चीले युद्ध में घसीटा है. अमेरिका के आम नागरिकों ने इस युद्ध और इजराइल के प्रति अंधे समर्थन को अपनी जेब और घरेलू अर्थव्यवस्था पर बढ़ते बोझ से जोड़कर देखा, जिसका सीधा असर मतदान पर पड़ा.
हार स्वीकारने के बजाय चुनावी नतीजों पर सवाल
चुनाव में मिली शिकस्त पर दोनों नेताओं का रवैया काफी अलग रहा है. ट्रंप ने अनिच्छा से ही सही, लेकिन यह स्वीकार किया कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और ईरान युद्ध ने उनकी पार्टी को नुकसान पहुंचाया. इसके विपरीत, नेतन्याहू ने इजराइल के चुनावी नतीजों पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.
उन्होंने विदेशी ताकतों पर अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के पक्ष में अवैध मतदान बढ़ाने का आरोप लगाया है. 2020 के अमेरिकी चुनाव के बाद ट्रंप के रुख की तरह, नेतन्याहू ने भी इजराइल की आंतरिक सुरक्षा सेवा 'शिन बेट' से जांच कराने की मांग की है और चुनाव परिणामों के प्रमाणीकरण को स्वीकार न करने की धमकी दी है.
अमेरिकी सैन्य सहायता पर संशय के बादल
मतदान के दौरान ही राष्ट्रपति ट्रंप ने एक टीवी इंटरव्यू में यह घोषणा कर सबको चौंका दिया कि अमेरिका 2026 के अंत के बाद इजराइल को दी जाने वाली 4 अरब डॉलर की वार्षिक सैन्य सहायता बंद कर देगा. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने यह कदम अमेरिकी जनता के गुस्से को शांत करने के लिए उठाया है.
हालांकि, न्यूयॉर्क में इजराइल के पूर्व राजदूत अलोन पिकास का कहना है कि इजराइल धन के बिना तो रह सकता है, लेकिन अमेरिकी हथियारों की पहुंच के बिना उसका काम नहीं चल सकता. फिलहाल हथियारों की आपूर्ति और भावी रणनीतिक समझौतों को लेकर स्थिति पूरी तरह से अनिश्चित बनी हुई है.