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क्या डेमोक्रेट ट्रंप की नीतियों को बदल पाएंगे?

मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार के बाद अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर अब डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो गया है. जानिए ईरान युद्ध, टैरिफ और इमिग्रेशन जैसे अहम मुद्दों पर क्या ट्रंप की नीतियां बदल पाएंगी.

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05 नव. 2026, 12:53 AM 4 मिनट में पढ़ें 32

डोनाल्ड ट्रंप- राष्ट्रपति अमेरिका
डोनाल्ड ट्रंप- राष्ट्रपति अमेरिका

नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. डेमोक्रेटिक पार्टी ने एकजुट होकर संसद के दोनों सदनों—प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट (Senate)—पर अपना कब्जा जमा लिया है.

जनवरी की शुरुआत में बुलाई जाने वाली नई कांग्रेस (अमेरिकी संसद) ट्रंप के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के शुरुआती दो सालों से पूरी तरह अलग होगी, जहां अब तक रिपब्लिकन पार्टी का दोनों सदनों में वर्चस्व था. हालांकि अब डेमोक्रेट्स के पास ट्रंप की नीतियों की पड़ताल करने और उनके किसी भी नए विधेयक को रोकने की मजबूत ताकत होगी, लेकिन इसके बावजूद एक अमेरिकी राष्ट्रपति के पास बिना संसदीय मंजूरी के भी फैसले लेने के कई रास्ते खुले रहते हैं.

अमेरिका-इजरायल का ईरान युद्ध और सैन्य बजट पर संकट

राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद स्वीकार किया है कि ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध ने इन चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार में बड़ी भूमिका निभाई है. फॉक्स न्यूज को दिए साक्षात्कार में उन्होंने माना कि चुनाव परिणामों का एक कारण यह युद्ध रहा.

ईंधन, राशन की बढ़ती कीमतों और महंगाई से परेशान मतदाताओं के गुस्से का डेमोक्रेट्स ने भरपूर फायदा उठाया और घरेलू खर्च व सामर्थ्य को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया.

बिना संसदीय मंजूरी के इजरायल के साथ मिलकर फरवरी में ईरान युद्ध की शुरुआत करने वाले ट्रंप के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी. आगामी 11 दिसंबर को सरकारी फंडिंग की मियाद खत्म हो रही है. नई कांग्रेस ट्रंप की सैन्य गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए अतिरिक्त सैन्य फंड पर रोक लगाने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकती है.

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हालांकि, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के रिसर्च फेलो जेम्स बॉय्स का मानना है कि युद्ध के मैदान में मौजूद अमेरिकी सैनिकों के रहते बजट काटना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि इसे सैनिकों की जान खतरे में डालने के रूप में देखा जा सकता है. इसके अलावा 1973 के 'वार पावर्स रिजॉल्यूशन' कानून से भी ट्रंप को रोकना मुश्किल लग रहा है, क्योंकि किसी भी राष्ट्रपति के वीटो को खारिज करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत (सुपरमजॉरिटी) की जरूरत होती है, जो डेमोक्रेट्स के पास नहीं है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज डब्लिन के प्रोफेसर स्कॉट लुकास के अनुसार, डेमोक्रेट्स उन रिपब्लिकन सांसदों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं जो चुनावी हार के बाद ट्रंप से दूरी बनाना चाहते हैं. खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शुरुआत से ही इस युद्ध के खिलाफ रहे हैं और हाल ही में उन्होंने ईरान को एक पत्र भेजकर वार्ता बहाल करने का प्रयास किया है.

दूसरी ओर, जेम्स बॉय्स का यह भी कहना है कि क्योंकि ट्रंप संविधान के तहत तीसरा कार्यकाल नहीं लड़ सकते, इसलिए वे किसी भी चुनावी दबाव से मुक्त होकर मध्य पूर्व में अपने फैसले लागू करने के लिए और अधिक उग्र कदम उठा सकते हैं.

टैरिफ और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अदालती और संसदीय घेराबंदी

पिछले साल ट्रंप ने अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करने के इरादे से करीब 90 देशों पर 10 से 50 प्रतिशत तक टैरिफ (आयात शुल्क) लगा दिया था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा फरवरी में इस फैसले को खारिज करने के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने दूसरे कानून का सहारा लेकर 150 दिनों के लिए 15 प्रतिशत टैरिफ लागू कर दिया.

डेमोक्रेटिक पार्टी ने इन शुल्कों को देश में बढ़ती महंगाई का जिम्मेदार ठहराया है और आरोप लगाया है कि ये टैरिफ आम अमेरिकी जनता की जेब पर डाका डाल रहे हैं. नया डेमोक्रेटिक बहुमत अमेरिकी निर्यातकों को राहत देने के लिए छूट का दबाव बना सकता है, लेकिन व्यापार नीति में कोई बड़ा बदलाव 2028 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद ही संभव दिखता है.

इसके अलावा, चीन पर तकनीकी प्रतिबंधों को सख्त करने के मामले में दोनों पार्टियां एकमत दिख रही हैं. Remote Access Security Act और Chip Security Act जैसे कानून संसद में सर्वसम्मति से पारित हो सकते हैं ताकि आधुनिक एआई तकनीक विदेशी विरोधियों के हाथ न लग सके.

अप्रवासन नीति, कड़े कड़े नियम और संसदीय जांच का सामना

संसद पर नियंत्रण मिलते ही डेमोक्रेट्स के पास सभी शक्तिशाली संसदीय समितियों की अध्यक्षता आ जाएगी, जिससे उनके पास सम्मन (subpoena) जारी करने और जांच शुरू करने का पूरा अधिकार होगा.

इस अधिकार के जरिए डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन की आव्रजन (Immigration) और शरणार्थियों को देश से निकालने की आक्रामक नीतियों की व्यापक जांच करने की तैयारी में हैं. विशेष रूप से अमेरिकी कर एजेंसी (IRS) और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के बीच हुए तालमेल को जांच के दायरे में लाया जाएगा.

चुनावी सर्वे के अनुसार 53 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं का मानना था कि ट्रंप सरकार की इमिग्रेशन कार्रवाई हद से ज्यादा सख्त हो चुकी थी. भले ही होमलैंड सिक्योरिटी विभाग का दावा हो कि हिरासत में लिए गए 70 प्रतिशत लोग आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं, लेकिन आलोचक इस आंकड़े पर सवाल उठा रहे हैं.

संसद में आए इस बड़े बदलाव के बाद अब स्थानीय समुदायों और राज्यों के पास जिम्मेदार नीतियां आगे बढ़ाने और ट्रंप की विवादास्पद प्रशासनिक कार्रवाइयों पर प्रभावी नियंत्रण लगाने का अवसर होगा.

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